कविता क्या है
खेती है
कवि के बेटा-बेटी है,
बाप का सूद है, माँ की रोटी है.
[Kavishala Labs] ये कविता लिखी है रमाशंकर यादव 'विद्रोही ने. अगर आपको जानना है कि दरअसल "कविता" क्या होती है तो आप "विद्रोही" की कविताओं को पढ़िए. समकालीन कवियों में रमाशंकर यादव 'विद्रोही की अपनी एक अलग पहचान है. "विद्रोही" कि कविताओं में कबीर, कालिदास, रहीम जैसे महान कवियों की गूढ़ता छुपी हुई है. उनकी कविताओं में चाँद की शीतलता है तो सूरज का ताप भी. वे एक ऐसे कवि थे. जिन्होंने कविता लिखी नहीं, बल्कि कविता रची. विद्रोही के विषय में कहा जाता है कि वे कविताएं लिखते नहीं थे बल्कि अपने मस्तिष्क में ही कविताओं कि रचना कर उन्हें संगृहीत कर लेते थें. विद्रोही को अपनी ही नहीं बल्कि अन्य कवियों की कविताएं भी कंठस्थ थी.
रमाशंकर यादव 'विद्रोही' (3 दिसम्बर 1957 - 8 दिसंबर 2015) हिंदी के लोकप्रिय जनकवि हैं. प्रगतिशील परंपरा के इस कवि की रचनाओं का एकमात्र प्रकाशित संग्रह 'नई खेती' है. इस संग्रह का प्रकाशन इनके जीवन के अंतिम दौर 2011 ई में हुआ. वे स्नातकोत्तर छात्र के रूप में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से जुड़े. यह जुड़ाव आजीवन बना रहा.
विद्रोही सिर्फ उनका उपनाम ही नहीं था, बल्कि उनकी शख्शियत थी. वे हर उस चीज के विरोधी थे जो निज स्वार्थ के लिए मानव कि बलि चढ़ा देते हैं. वे हर उस परंपरा को नकारते थे जिसे किसी मनुष्य के जीवन से ज्यादा महत्व दिया जाता है. वे स्पस्ट देखने, बोलने, समझने और स्पस्ट होकर कविता कहने वाले कवि थे. उन्होंने हर उस रीति, परंपरा, पाखंड का विरोध किया जिसके जरिये मनुष्य या मनुष्यता का शोषण किया जाता है. विद्रोही का मानना था कि कविता के जरिये समाज में व्याप्त विसंगति को ख़त्म किया जा सकता है. वे कविता को सिर्फ छंद या रस से युक्त पंक्तियाँ नहीं बल्कि वे कविता को लाठी कहते थे. वे लिखते है-
तो क्या
आप मेरी कविता को सोंटा समझते हैं ?
मेरी कविता वस्तुतः
लाठी ही है,
इसे लो और भाँजो !
मगर ठहरो !
ये वो लाठी नहीं है जो
हर तरफ भंज जाती है
ये सिर्फ उस तरफ भंजती है
जिधर मैं इसे प्रेरित करता हूँ.
विद्रोही कि कविताओं में स्त्री के साथ हुए अत्याचारों का विरोध है. उन्होंने स्त्री के जीवन कि कठिनाइयों और संघर्षो को अपनी कविता में ढाला है. आदिकाल से परंपरा और सिर्फ "स्त्री" होने कि वजह से किसी स्त्री पर जो जुल्म होते रहे हैं, उनका चित्रण विद्रोही ने अपनी कविताओं में किया है.
कुछ औरतों ने
अपनी इच्छा से
कुएँ में कूद कर जान दी थी
ऐसा पुलिस के रिकार्डों में दर्ज़ है.
और कुछ औरतें
चिता में जल कर मरी थीं
ऐसा धर्म की किताबों में लिखा है
....मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित
दोनों को एक ही साथ
औरतों की अदालत में तलब कर दूँगा
और बीच की सारी अदालतों को
मंसूख कर दूँगा.
विद्रोही सही मायने में जन कवि थे. उनका विद्रोह धर्म, ईश्वर की सत्ता और उसकी कट्टरता, हिंसा के विरुद्ध है. उनका आक्रोश स्त्री की ओर से उसके शोषकों और उन पितृसत्तात्मक सामाजिक ढर्रों के विरुद्ध है जो स्त्री-अस्मिता की चोरी करते हैं. जातीय वर्ग की असमानता व उन धारणाओं के विरुद्ध है जो जाति आधारित शोषण की संस्कृति निर्मित करती हैं. उन्होंने शोषक सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक संरचनाओं का विरोध किया. विद्रोही पूँजीवादी शोषण के समक्ष जनता की शक्ति पर यक़ीन करते है. उनकी कविता जन-गण-मन में उनका आक्रोश देखने को मिलता है.
जन-गण-मन
मैं भी मरूंगा
और भारत के भाग्य विधाता भी मरेंगे
लेकिन मैं चाहता हूं
कि पहले जन-गण-मन अधिनायक मरें
फिर भारत भाग्य विधाता मरें
फिर साधू के काका मरें
यानी सारे बड़े-बड़े लोग पहले मर लें
फिर मैं मरूं- आराम से
उधर चल कर वसंत ऋतु में
जब दानों में दूध और आमों में बौर आ जाता है
या फिर तब जब महुवा चूने लगता है
या फिर तब जब वनबेला फूलती है
नदी किनारे मेरी चिता दहक कर महके
और मित्र सब करें दिल्लगी
कि ये विद्रोही भी क्या तगड़ा कवि था
कि सारे बड़े-बड़े लोगों को मारकर तब मरा।
विद्रोही मुख्यतः प्रगतिशील चेतना के कवि हैं. उनकी कविताएं लंबे समय तक अप्रकाशित और उनकी स्मृति में सुरक्षित रही. वे अपनी कविता सुनाने के अंदाज के कारण बहुत लोकप्रीय रहे. 2011 ई॰ में उनकी रचनाओं का प्रकाशन 'नई खेती' शीर्षक संग्रह से हुआ.विद्रोही की कविताओं में जिस तरह के बिंब देखने को मिलते हैं वैसे हिंदी साहित्य में दुर्लभ है. पढ़िए उनकी कुछ कविताएं-
[१]
मैं किसान हूँ
आसमान में धान बो रहा हूँ
कुछ लोग कह रहे हैं
कि पगले! आसमान में धान नहीं जमा करता
मैं कहता हूँ पगले!
अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है
तो आसमान में धान भी जम सकता है
और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा
या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा
या आसमान में धान जमेगा।
[२]
तुम मुझसे
हाले-दिल न पूछो ऐ दोस्त!
तुम मुझसे सीधे-सीधे तबियत की बात कहो।
और तबियत तो इस समय ये कह रही है कि
मौत के मुंह में लाठी ढकेल दूं,
या चींटी के मुह में आंटा गेर दूं।
और आप- आपका मुंह,
क्या चाहता है आली जनाब!
जाहिर है कि आप भूखे नहीं हैं,
आपको लाठी ही चाहिए,
तो क्या
आप मेरी कविता को सोंटा समझते है?
मेरी कविता वस्तुतः
लाठी ही है,
इसे लो और भांजो!
मगर ठहरो!
ये वो लाठी नहीं है जो
हर तरफ भंज जाती है,
ये सिर्फ उस तरफ भंजती है
जिधर मैं इसे प्रेरित करता हूं।
मसलन तुम इसे बड़ों के खिलाफ भांजोगे,
भंज जाएगी।
छोटों के खिलाफ भांजोगे,
न,
नहीं भंजेगी।
तुम इसे भगवान के खिलाफ भांजोगे,
भंज जाएगी।
लेकिन तुम इसे इंसान के खिलाफ भांजोगे,
न,
नहीं भंजेगी।
कविता और लाठी में यही अंतर है।
[३]मोहनजोदाड़ो
...और ये इंसान की बिखरी हुई हड्डियाँ
रोमन के गुलामों की भी हो सकती हैं और
बंगाल के जुलाहों की भी या फिर
वियतनामी, फ़िलिस्तीनी बच्चों की
साम्राज्य आख़िर साम्राज्य होता है
चाहे रोमन साम्राज्य हो, ब्रिटिश साम्राज्य हो
या अत्याधुनिक अमरीकी साम्राज्य
जिसका यही काम होता है कि
पहाड़ों पर पठारों पर नदी किनारे
सागर तीरे इंसानों की हड्डियाँ बिखेरना

