[Kavishala Labs] साहित्य की विभिन्न विधाओं में व्यंग्य विधा ही एक ऐसी विधा है जो सामाजिक कुरीतियों, पाखंड, आडम्बर, राजनीतिक खामियों और सरकारी अव्यवस्था पर खुल कर प्रहार करती है. हिंदी साहित्य में कई श्रेष्ठ व्यंग्यकार हुए जिन्होंने अपने व्यंग्यबाण से समाज में फैले कुरीतियों व बुराइयों पर प्रहार किया. शरद जोशी भी एक ऐसे ही व्यंग्यकार थे जिन्होंने बड़ी ही बेबाकी से सामाजिक विसंगतियों, राजनीति के गिरते स्तर, सरकारी ढुलमुल रवैये के खिलाफ अपनी कलम चलाई. 


शरद जोशी का जन्म 21 मई 1931 को मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में हुआ था. कुछ समय तक सरकारी नौकरी करने के बाद उन्होंने लेखन को ही अपनी आजीविका का माध्यम बना लिया और आजीवन लेखन ही करते रहे. उन्होंने शुरुआत में कहानियाँ लिखीं, फिर पूरी तरह व्यंग्य-लेखन ही करने लगे. शरद जोशी ने व्यंग्य लेख, व्यंग्य उपन्यास, व्यंग्य कॉलम के अतिरिक्त हास्य-व्यंग्यपूर्ण धारावाहिकों की पटकथाएँ और संवाद भी लिखे. 


शरद जोशी ने व्यंग्य विधा में कई श्रेष्ठ रचनाएं लिखी. वे अपने समय के अनूठे व्यंग्यकार थे. उन्होंने तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विसंगतियों की गहरी पड़ताल की और अपने बेबाक अंदाज में उनपर व्यंग्य प्रहार किया. कहते हैं कि शरद जोशी पहले व्यंग्य नहीं लिखते थे, लेकिन बाद में अपनी आलोचना से खिन्न होकर उन्होंने व्यंग्य लिखना शुरू कर दिया. शरद जोशी भारत के पहले व्यंग्यकार थे, जिन्होंने पहली बार मुंबई में ‘चकल्लस’ के मंच पर 1968 में गद्य पढ़ा और किसी कवि से अधिक लोकप्रिय हुए.

 

शरद जोशी ने अपने लेखन के बारे में कहा था, "लिखना मेरे लिए जीवन जीने की तरकीब है. इतना लिख लेने के बाद अपने लिखे को देख मैं सिर्फ यही कह पाता हूं कि चलो, इतने बरस जी लिया. यह न होता तो इसका क्या विकल्प होता, अब सोचना कठिन है. लेखन मेरा निजी उद्देश्य है.' वे अपने जीवन के बारे में कहते है कि, अब जीवन का विश्लेषण करना मुझे अजीब लगता है. बढ़-चढ़ कर यह कहना कि जीवन संघषर्मय रहा, लेखक होने के कारण मैंने दुखी जीवन जिया , कहना फिजूल है. जीवन होता ही संघषर्मय है. किसका नहीं होता? लिखनेवाले का होता है तो क्या अजब होता है.'


हिन्दी व्यंग्य को आगे बढ़ाने, उसमे सुधार करने और व्यंग्य को प्रतिष्ठा दिलाने में शरद जोशी का महत्वपूर्ण योगदान है. उनके द्वारा लिखे गए व्यंग्य आज भी प्रासंगिक हैं. उनकी रचनाओं में समाज में पाई जाने वाली सभी विसंगतियों का बेबाक चित्रण मिलता है. उन्होंने निडरता से समाज की हर विसंगति पर प्रहार किया. उनके लेखन में मनोविज्ञानिक, वैज्ञानिक व तार्किक पहलू देखने को मिलते हैं. वे लिखते है -


१-आलोचना शब्द लुच धातु से बना है जिसका अर्थ है देखना. लुच धातु से ही बना है ‘लुच्चा’.


२- अतिथि केवल देवता नहीं होता, वो मनुष्य और कई बार राक्षस भी हो सकता है.


३- मैं ज़रा प्रतिबद्ध हो गया हूं आजकल. यों मैं स्वतंत्र हूं और आश्चर्य नहीं कि समय आने पर मैं बोलूं भी.


४-शासन ने हम बुद्धिजीवियों को यह रोटी इसी शर्त पर दी है, कि इसे मुंह में ले हम अपनी चोंच को बंद रखें.


५-अरे! रेल चल रही है और आप उसमें जीवित बैठे हैं, यह अपने आप में कम उपलब्धि नहीं है.


६-आदमी हैं, मगर मनुष्यता नहीं रही. दिल हैं मगर मिलते नहीं. देश अपना हुआ, मगर लोग पराये हो गए.


७-उत्तेजना को समय में लपेटा जा सकता है. धीरे-धीरे बात ठंडी पड़ने लगती है. लोग संदर्भ भूलने लगते हैं.


८- एक मनुष्य ज़्यादा दिनों देवता के साथ नहीं रह सकता. देवता का काम है दर्शन दे और लौट जाए, तुम भी लौट जाओ अतिथि.


९- जो लिखेगा सो दिखेगा, जो दिखेगा सो बिकेगा-यही जीवन का मूल मंत्र है.


१०- लेखक विद्वान हो न हो, आलोचक सदैव विद्वान होता है.