
रमाशंकर यादव विद्रोही को गए हुए कई साल हो गए हैं लेकिन विद्रोही की कविता से गुजरते हुए लगता है कि विद्रोही अभी जिंदा हैं. सारे बड़े-बड़े लोग पहले मर लेंगे, सारे क्रूर लोग, तानाशाह, जुल्मी मर जाएंगे, उसके बाद विद्रोही मरेंगे ‘आराम से, उधर चल कर वसंत ऋतु में, जब दानों में दूध और आमों में बौर आ जाता है.’ विद्रोही की कविताओं में जिस तरह के बिंब देखने को मिलते हैं अन्यत्र हिंदी साहित्य में दुर्लभ है। जैसे विद्रोही की नानी मोहनजोदड़ो के तालाब में नहाती हैं, गाय को एवरेस्ट के खूंटे में बांधती हैं। विद्रोही हिंदी का अकेला कवि है जिसने 'निजी संपत्ति' के सारे मानकों को तोड़ फोड़कर फेंक दिया और जिंदगी भर मजलूमों की आवाज़ को कुव्वत दी।
रमाशंकर यादव विद्रोही की 'औरतें':
कुछ औरतों ने अपनी इच्छा से कूदकर जान दी थी
ऐसा पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज है
और कुछ औरतें अपनी इच्छा से चिता में जलकर मरी थीं
ऐसा धर्म की किताबों में लिखा हुआ है
मैं कवि हूँ, कर्त्ता हूँ
क्या जल्दी है
मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित दोनों को एक साथ
औरतों की अदालत में तलब करूँगा
और बीच की सारी अदालतों को मंसूख कर दूँगा
मैं उन दावों को भी मंसूख कर दूंगा
जो श्रीमानों ने औरतों और बच्चों के खिलाफ पेश किए हैं
मैं उन डिक्रियों को भी निरस्त कर दूंगा
जिन्हें लेकर फ़ौजें और तुलबा चलते हैं
मैं उन वसीयतों को खारिज कर दूंगा
जो दुर्बलों ने भुजबलों के नाम की होंगी.
मैं उन औरतों को
जो अपनी इच्छा से कुएं में कूदकर और चिता में जलकर मरी हैं
फिर से ज़िंदा करूँगा और उनके बयानात
दोबारा कलमबंद करूँगा
कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया?
कहीं कुछ बाक़ी तो नहीं रह गया?
कि कहीं कोई भूल तो नहीं हुई?
क्योंकि मैं उस औरत के बारे में जानता हूँ
जो अपने सात बित्ते की देह को एक बित्ते के आंगन में
ता-जिंदगी समोए रही और कभी बाहर झाँका तक नहीं
और जब बाहर निकली तो वह कहीं उसकी लाश निकली
जो खुले में पसर गयी है माँ मेदिनी की तरह
