वरिष्ठ पत्रकार और भाषाविद राहुल देव कविशाला संवाद में सम्मिलित हुए. उन्होंने हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के संरक्षण व प्रसार के संदर्भ में अपने विचार व्यक्त किये. इस भाषा विमर्श संवाद का संचालन सुविख्यात कवि एवं साहित्यकार लक्ष्मी शंकर बाजपई ने किया. प्रस्तुत है कविशाला संवाद से कुछ अंश -  


राहुल देव जी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वे सिर्फ हिंदी भाषा के परित्राण व संरक्षण की बात नई करते अपितु उन्हें हिंदी के साथ साथ भारत की अन्य भाषाओँ की भी चिंता है. आजादी के बाद से लगभग २०० भारतीय भाषाएँ ख़त्म हो चुकी है. यदि हम अभी भी नहीं चेते तो अगली दो पीढ़ियों में हिंदी भाषा ख़त्म हो सकती है. भारत की भारतीयता केवल हिंदी भाषा से नहीं है बल्कि भारत की भारतीयता भारत की समस्त भाषाओं से है. जिस प्रकार संसार को बचाने के लिए जैव विविधता को बचाने की आवश्यकता है, उसके अधिक आवश्यक है भाषाओं की विविधता को बचाना. 


लक्ष्मी शंकर बाजपई जी द्वारा हिंदी भाषा को बचाने के उपाय के प्रश्न का उत्तर देते हुए राहुल देव जी ने कहा कि किसी भी भाषा का किसी भी अन्य भाषा से कोई विरोध नहीं है. लेकिन हमें सदैव अपने देश की भाषा को प्राथमिकता देनी चाहिए. हमारा जो हिंदी समाज है वो आत्म लज्जित समाज है. वो छोटा महसूस करता है, उसे अपनी भाषा पर गर्व नहीं है. आज अधिकांश भारतीय के दिमाग में एक भय व्याप्त हो चुका है कि यदि उनके बच्चो को अंग्रेजी भाषा की शिक्षा नहीं मिली तो उनके बच्चे पिछड़ जायेंगे. 


राहुल देव जी ने कहा कि एक शोध के अनुसार ८ से १० वर्ष तक के बच्चो को अपनी मात्र भाषा सीखनी आवश्यक है. ताकि उसकी नीव मजबूत हो जाये. अपनी मात्र भाषा सीखने और समझने के पश्चात वह बच्चा अंग्रेजी या अन्य किसी भी भाषा को बिना समस्या के सीख सकता है. भाषा सिर्फ शब्द नहीं है वो अपने साथ समूची संस्कृति लेकर आती है. आज जो बच्चे ५-६ वर्ष आयु में अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में पढ़ने जाते है, उन बच्चो कि रूचि बदल गयी है.अंग्रेजी भाषा के साथ साथ उनके अंदर अंग्रेजी संस्कृति भी जन्म ले रहीं है. अब इन बच्चो को हिंदी नहीं बल्कि अंग्रेजी संगीत भाने लगा है. उनके परिधान और रहन सहन भी अंग्रेजी होने लगी है. यहाँ तक की उनका स्वाद भी अंग्रेजी होने लगा है. 


हिंदी भाषा व या अन्य भारतीय भाषा वालों को प्रारंभिक चीजों के लिए अंग्रेजी की जगह हिंदी या अपनी अन्य भारती भाषा उपयोग करनी चाहिए. उन्हें फादर के स्थान पर पिता, मदर के स्थान पर माता, सिस्टर के स्थान पर बहन आदि शब्दों को प्रयोग करना है. ऐसे ही उन्हें किचन की जगह रसोई, चेयर की जगह कुर्सी बुक की जगह किताब शब्द का प्रयोग करना चाहिए. उन्हें हिंदी की जगह अंग्रेजी नहीं ठूसनी चाहिए. अंग्रेजी या अन्य भाषा सीखना भी अच्छी बात है लेकिन अपनी भाषा के शर्त पर नहीं.


लक्ष्मी शंकर बाजपई जी ने कहा हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं को बचाने के लिए हमें छोटे बदलाव करने की आवश्यकता है. जैसे हम हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में अख़बार पढ़े, किताब पढ़े आम बोलचाल की भाषा में अंग्रेज का प्रयोग न करें. जब हम ऐसे छोटे बदलाव अपनायेंगे तभी भारतीय भाषाओं की रक्षा संभव है.