[Kavishala Labs] हिंदी साहित्य में अनेक विद्वान साहित्यकार हुए है. जिहोने अपनी साहित्यिक रचनाओं से जीवन जीने की कला सिखाई व समाज को सही दिशा दिखाने का कार्य किया है. कविवर वृंद एक ऐसे ही विद्वान साहित्यकार थें जिन्होंने अपनी रचनाओं से जीवन जीने की कला सिखाई. कविवर वृंद के नीति के दोहे अति लोकप्रिय हैं.
वृन्द (1643-1723) हिन्दी भाषा के कवि थे. रीतिकालीन परम्परा के अन्तर्गत वृन्द का नाम आदर के साथ लिया जाता है. कविवर वृंद के जीवन के सन्दर्भ में कई विद्वानों के अलग अलग मत है. पं॰ रामनरेश त्रिपाठी अनुसार कविवर वृंद का जन्म सन् 1643 में मथुरा (उ.प्र.) क्षेत्र के किसी गाँव में हुआ था. जबकि डॉ॰ नगेन्द्र ने मेड़ता गाँव को वृंद का जन्म स्थान माना है. इनका मूल नाम 'वृन्दावनदास' था. कहा जाता है की दस वर्ष की आयु में वृंद काशी आये और तारा जी नामक एक पंडित के पास रहकर उन्होंने साहित्य, दर्शन आदि विधाओं का ज्ञान प्राप्त किया. यहीं उन्होंने व्याकरण, साहित्य, वेदान्त, गणित आदि का ज्ञान प्राप्त किया और काव्य रचना सीखी.
कविवर वृन्द की ग्यारह रचनाएं उपलब्ध है. शिखर छंद, भाव पंचाशिका, शृंगार शिक्षा, पवन पचीसी, हितोपदेश सन्धि, वृन्द सतसई, वचनिका, सत्य स्वरूप, यमक सतसई, हितोपदेशाष्टक, भारत कथा . वृन्द ग्रन्थावली नाम से वृन्द की समस्त रचनाओं का एक संग्रह डॉ॰ जनार्दन राव चेले द्वारा संपादित किया गया था. जिसका प्रकाशन १९७१ मे हुआ था .
वृंद की रचनाएं “वृन्द विनोद सतसई” में संकलित हैं. उनके “बारहमासा” में बारहों महीनों का सुन्दर वर्णन है. “भाव पंचासिका” में शृंगार के विभिन्न भावों के अनुसार सरस छंद लिखे हैं. “शृंगार शिक्षा” में नायिका भेद के आधार पर आभूषण और शृंगार के साथ नायिकाओं का चित्रण हुआ है. नयन पचीसी में नेत्रों के महत्व का चित्रण किया है. इस रचना में दोहा, सवैया और घनाक्षरी छन्दों का प्रयोग हुआ है. पवन पचीसी में ऋतु वर्णन है.
हिन्दी साहित्य में वृन्द के समान सुन्दर व नीतिपरक दोहे बहुत कम कवियों ने लिखे हैं. उनके दोहों की लोकप्रियता शहरों से लेकर गाँवों तक में है. पढ़िए कविवर वृंद द्वारा रचित जीवन को दिशा देने वाले कुछ दोहे.
---
करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात ते सिल पर परत निशान।।
---
ओछे नर के पेट में, रहै न मोटी बात।
आध सेर के पात्र में, कैसे सेर समात।।
---
विद्या धन उद्यम बिना, कहो जू पावै कौन ।
बिना डुलाये ना मिलै, ज्यौं पंखा की पौन ॥
---
बनती देख बनाइये, परन न दीजै खोट ।
जैसी चलै बयार तब, तैसी दीजै ओट ॥
---
मधुर वचन ते जात मिट, उत्तम जन अभिमान ।
तनिक सीत जल सों मिटै, जैसे दूध उफान ॥
---
सबै सहायक सबल के, कोउ न निबल सहाय ।
पवन जगावत आग को, दीपहिं देत बुझाय ॥
---
अति हठ मत कर हठ बढ़े, बात न करिहै कोय ।
ज्यौं –ज्यौं भीजै कामरी, त्यौं-त्यौं भारी होय ॥
---
लालच हू ऐसी भली, जासों पूरे आस ।
चाटेहूँ कहुँ ओस के, मिटत काहु की प्यास ॥
---
कछु कहि नीच न छेडिए, भले न वाको संग।
पाथर डारै कीच मैं, उछरि बिगारै अंग॥
---
अपनी पहुँच बिचारि कै, करतब करिये दौर।
तेते पाँव पसारिये, जेती लाँबी सौर॥
---
बुरे लगत सिख के बचन, हिए बिचारो आप।
करुवे भेषज बिन पिये, मिटै न तन को ताप॥
---
फेर न ह्वैहैं कपट सों, जो कीजै ब्यौपार।
जैसे हांडी काठ की, चढै न दूजी बार॥
---
नैना देत बताय सब, हिय को हेत अहेत।
जैसे निरमल आरसी, भली-बुरी कहि देत॥
---
अति परिचै ते होत है, अरुचि अनादर भाय।
मलयागिरि की भीलनी, चंदन देत जराय॥
---
भले बुरे सब एक से, जौं लौं बोलत नाहिं।
जान परतु है काक पिक, रितु बसंत का माहिं॥

