हिंदी भाषा में कई उत्कृष्ट साहित्यकार हुए हैं जिन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में अपना अमूल्य योगदान दिया है. हिंदी साहित्य का विकास कई चरणों में हुआ है. समय समय पर साहित्यकारों ने कई तरह के प्रयोग किये. इन प्रयोगों के फलस्वरूप कई महत्वपूर्ण विधाओं का जन्म हुआ. पूर्व के साहित्यकारों के द्वारा रची गयी रचनाएँ हिंदी साहित्य की नींव है. आइये जानते है उस साहित्यकार के बारे में जिसने हिंदी साहित्य का पहला उपन्यास लिखा.


श्रीनिवास दास (1850-1907) भारतेंदु युग के प्रसिद्ध नाटकार थे. नाटक लेखन में वे भारतेंदु के समकक्ष माने जाते हैं. वे हिंदी, उर्दू, संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी के अच्छे ज्ञाता थे. लाला श्रीनिवास दास को हिंदी का पहला उपन्यास लिखने का गौरव प्राप्त है. इस उपन्यास का नाम परीक्षा गुरू (हिन्दी का प्रथम उपन्यास) है जो 25 नवम्बर 1882 को प्रकाशित हुआ. उपन्यास के अलावा नाटक रचना में भी उनकी विशेष ख्याति है. उनकी भाषा और शैली पर अंग्रेजी तथा उर्दू, फारसी का पर्याप्त प्रभाव है. उनके नाटकों में प्रह्लाद चरित्र, तप्ता संवरण, रणधीर और प्रेम मोहिनी और संयोगिता स्वयंवर शामिल हैं.


परीक्षा गुरू (उपन्यास) की कथावस्तु :- इस उपन्यास में श्रीनिवास दास जी ने मदनमोहन नामक एक रईस के पतन और फिर सुधार की कहानी सुनाई है. मदनमोहन एक समृद्ध वैश्व परिवार में पैदा होता है, पर बचपन में अच्छी शिक्षा और उचित मार्गदर्शन न मिलने के कारण और युवावस्था में गलत संगति में पड़कर अपनी सारी दौलत खो बैठता है. इस कठिन स्थिति में उसका सच्चा मित्र ब्रजकिशोर, जो एक वकील है, उसकी मदद करता है और उसकी खोई हुई संपत्ति उसे वापस दिलाता है. इतना ही नहीं, मदनमोहन को सही उपदेश देकर उसे अपनी गलतियों का एहसास भी कराता है.  


उपन्यास की भाषा शैली :- उपन्यास की भाषा हिंदी के प्रारंभिक गद्य का अच्छा नमूना है. उसमें संस्कृत और फारसी के कठिन शब्दों से यथा संभव बचा गया है. सरल, बोलचाल की भाषा में कहानी का वर्णन किया गया है. इसके बावजूद पुस्तक की भाषा गरिमायुक्त और अभिव्यंजनापूर्ण है. वर्तनी के मामले में श्रीनिवास दास ने बोलचाल की पद्धति अपनाई है. कई शब्दों को अनुनासिक बनाकर या मिलाकर लिखा है, जैसे, रोनें, करनें, पढ़नें, आदि, तथा, उस्समय, कित्ने, उन्की, आदि. “में” के लिए “मैं”, “से” के लिए “सैं”, जैसे प्रयोग भी इसमें मिलते हैं. कुछ अन्य वर्तनी दोष भी देखे जा सकते हैं, जैसे, समझदार के लिए समझवार, विवश के लिए बिबश. पर यह देखते हुए कि यह उपन्यास उस समय का है जब हिंदी गद्य स्थिर हो ही रहा था, उपन्यास की भाषा काफी सशक्त ही मानी जाएगी.


इस उपन्यास की भाषा का एक उदाहरण -


“सुख-दुःख तो बहुधा आदमी की मानसिक वृत्तियों और शरीर की शक्ति के आधीन है। एक बात सै एक मनुष्य को अत्यन्त दःख और क्लेश होता है वही दूसरे को खेल तमाशे की-सी लगती है इसलिए सुख-दुःख होनें का कोई नियम मालूम होता” मुंशी चुन्नीलाल नें कहा।


“मेरे जान तो मनुष्य जिस बात को मन से चाहता है उस्का पूरा होना ही सुख का कारण है और उस्मैं हर्ज पड़नें ही सै दुःख होता है” मास्टर शिंभूदयाल ने कहा।


इस उपन्यास में कहीं-कहीं पर संस्कृत, हिंदी, फारसी के ग्रंथों के ढेर सारे उद्धरण भी ब्रज भाषा में काव्यानुवाद के रूप में दिए गए हैं. हर प्रकरण के प्रारंभ में भी ऐसा एक उद्धरण है. उन दिनों काव्य और गद्य की भाषा अलग-अलग थी. काव्य के लिए ब्रज भाषा का प्रयोग होता था और गद्य के लिए खड़ी बोली का. लेखक ने इसी परिपाटी का अनुसरण करते हुए उपन्यास के काव्यांशों के लिए ब्रज भाषा चुना है.


श्रीनिवास दास द्वारा रचित परीक्षा गुरु हिंदी उपन्यास विधा की नींव के रूप में स्थापित है. इस उपन्यास के बाद कई अन्य हिंदी साहित्यकारों ने उपन्यास विधा पर उत्कृष्ट रचनाएँ की है. समय के साथ उपन्यास हिंदी साहित्य की सबसे ज्यादा पढ़ी और पसंद की जाने वाली विधा के रूप में स्थापित है.