भारतीय साहित्यकरों ने न केवल अपनी रचनाओं से समाज को नई दिशा दी बल्कि उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में कई कीर्तिमान स्थापित कर भारत का नाम विश्व पटल पर गौरवान्वित किया है. भक्तिकाल के महान कवि सूरदास विश्व में सर्वाधिक पदों की रचना करने वाले एक मात्र कवि थे.


सूरदास हिन्दी के भक्तिकाल के महान कवि थे. हिन्दी साहित्य में भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक और ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि सूरदास को हिंदी साहित्य का सूर्य माना जाता है. सूरदास जन्म से अंधे थे या नहीं, इस सम्बम्ध में विद्वानों में मतभेद है.


सूरदास का जन्म १४८३ ई० में रुनकता नामक गाँव में हुआ. कुछ विद्वानों का मत है कि सूर का जन्म सीही गांव में हुआ था. सूरदास के पिता, रामदास गायक थे. प्रारंभ में सूरदास आगरा के समीप गऊघाट पर रहते थे.सूरदास की मृत्यु गोवर्धन के निकट पारसौली ग्राम में १५८४ ईस्वी में हुई. 


सूरदास की प्रतिभा को देखकर आचार्य श्री वल्लभ ने उन्हें दीक्षा दी एवं श्रीनाथ एवं पर ब्रज श्रीकृष्ण का गुणानवादन करने को कहा. सूरदास की प्रतिभा से सम्राट अकबर एवं संपूर्ण भारत की मध्यकालीन धार्मिक एवं साहित्य जगत आंदोलित था. सूरदास के 40 हजार पद उपलब्ध हैं. 



सूरदास के काव्य की विशेषताएँ - सूरदास ने वात्सल्य, श्रृंगार और शांत रसों को मुख्य रूप से प्रयोग किया है. उन्होंने अपनी कल्पना और प्रतिभा के सहारे कृष्ण के बाल्य-रूप का अति सुंदर, सरस, सजीव और मनोवैज्ञानिक वर्णन किया है. बालकों की चपलता, स्पर्धा, अभिलाषा, आकांक्षा का वर्णन करने में विश्व व्यापी बाल-स्वरूप का चित्रण किया है. बाल-कृष्ण की एक-एक चेष्टा के चित्रण में उन्होंने सूक्ष्म से सूक्ष्म तथ्यों का वर्णन किया है. इस पंक्ति उनकी ये विशेषता झलकती है. 


मैया कबहिं बढैगी चौटी?

किती बार मोहिं दूध पियत भई, यह अजहूँ है छोटी।


श्रृंगार रस, प्रेम के स्वच्छ और मार्जित रूप का चित्रण भारतीय साहित्य में किसी और कवि ने नहीं किया है यह सूरदास की अपनी विशेषता है. वियोग के समय राधिका का जो चित्र सूरदास ने चित्रित किया है, वह इस प्रेम के योग्य है . जो कोमलकांत पदावली, भावानुकूल शब्द-चयन, सार्थक अलंकार-योजना, धारावाही प्रवाह, संगीतात्मकता एवं सजीवता सूर की भाषा में है, उसे देखकर तो यही कहना पड़ता है कि सूर ने ही सर्व प्रथम ब्रजभाषा को साहित्यिक रूप दिया है. 



विद्वानों के अनुसार सूरदास ने पांच ग्रंथों की रचना की थी (१) सूरसागर - जो सूरदास की प्रसिद्ध रचना है. जिसमें सवा लाख पद संग्रहित थे.(२) सूरसारावली, (३) साहित्य-लहरी - जिसमें उनके कूट पद संकलित हैं. (४) नल-दमयन्ती. (५) ब्याहलो


नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हस्तलिखित पुस्तकों की विवरण तालिका में सूरदास के १६ ग्रन्थों का उल्लेख है. इनमें सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी, नल-दमयन्ती, ब्याहलो के अतिरिक्त दशमस्कंध टीका, नागलीला, भागवत्, गोवर्धन लीला, सूरपचीसी, सूरसागर सार, प्राणप्यारी, आदि ग्रन्थ सम्मिलित हैं. इनमें प्रारम्भ के तीन ग्रंथ ही महत्त्वपूर्ण समझे जाते हैं, साहित्य लहरी की प्राप्त प्रति में बहुत प्रक्षिप्तांश जुड़े हुए हैं.


अपनी उत्कृष्ट रचनाओं से हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाले और विश्व में सर्वाधिक पदों की रचना करने वाले सूरदास सही मायने में हिंदी साहित्य के सूर्य है. सूरदास की रचनाएँ सदैव हिंदी साहित्य को आलोकित करती रहेंगी.