हास्य - व्यंग्य की खासियत होती है इसमें सीधे सीधे मुद्दे कि बात की जाती है . बशर्ते आपके पास उसे देखने के लिए पैनी नजर होनी चाहिए. सामाजिक बुराइयों के खिलाफ जितने सीधे तौर व्यंग के द्वारा प्रहार किया जा सकता है उतना किसी अन्य साहित्यिक विधा से करना संभव नहीं है. कई ऐसे हास्य व्यंग के लेखक व कवि हुए हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं से सामाजिक अवस्थाओं , राजनीती और सरकारी तंत्र की खामिया पर करारी चोट की है. मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी भी ऐसे ही एक हास्य व्यंग के लेखक थें जिन्होंने अपनी रचनाओं से सामाजिक बुराइयों पर वार किया.


मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी उर्दू के प्रसिद्ध व्यंग्यकार और हास्य लेखक थे. उनका जन्म 4 सितम्बर 1923 को टोंक, राजस्थान में हुआ था. बटवारे के बाद वे कराची पाकिस्तान में जा बसे. उनकी व्यंग्य की कई पुस्तकें और सभाएँ हुई हैं. लम्बी बीमारी की वजह से 20 जून 2018 को उनका देहांत कराची में हुआ. 


युसुफी की लेखन शैली बहुत प्रभावी थी जहाँ एक ओर आप उनको पढ़ते हुए हसेंगे तो वही दूसरी ओर आप एक गहरी सोंच में डूब जायेंगे. शब्दों के चुनाव में युसुफी बहुत ध्यान देते थे. और फिर ख्यालों को शब्दों में बड़े ही सलीके से पिरोते थे.  


उन्होंने समाज, मुल्क, सियासत, अर्थव्यवस्था, जीवनशैली, रुढ़िवादी मान्यताओं समेत लगभग हर विषय व बुराई के खिलाफ लिखा है. युसुफी के बारे में मशहूर कवि, लेखक व व्यंगकार इब्ने इंशा ने कहा था कि "अगर हम अपने जमाने के साहित्यिक हास्य-व्यंग्य को कोई नाम देंगे तो मेरे जेहन में सिर्फ यूसुफी का नाम आता है."  


प्रस्तुत है मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी के कुछ बेहतरीन उद्धरण-


[१]

“मर्द की आंख और औरत की जबान का दम सबसे आखिर में निकलता है।

[२]

लफ्जों की जंग में फतह किसी भी फरीक की हो, शहीद हमेशा सच्चाई होती है।

[३]

जो देश जितना गरीब होगा, उतना ही आलू और मजहब का चलन ज्यादा होगा।

[४]

दुश्मनों के तीन दर्जे हैः दुश्मन, जानी दुश्मन और रिश्तेदार।

[५]

मुसलमान किसी ऐसे जानवर को मुहब्बत से नहीं पालते जिसे जिबह करके खा न सकें।

[६]

मुहब्बत अंधी होती है, लिहाजा औरत के लिए खूबसूरत होना जरूरी नहीं, बस मर्द का नाबीना (अंधा) होना काफी होता है।

[७]

बुढ़ापे की शादी और बैंक की चौकीदारी में जरा भी फर्क नहीं, सोते में भी एक आंख खुली रखनी पड़ती है।

[८]

आदमी एक बार प्रोफेसर हो जाए तो उम्र भर प्रोफेसर ही रहता है, चाहे बाद में समझदारी की बातें ही क्यों ना करने लगे।

[९]

नाई की जरूरत सारी दुनिया को रहेगी जब तक कि सारी दुनिया सिक्ख धर्म ना अपना ले और सिक्ख ऐसा कभी होने नहीं देंगे।