ऐसे हालात न पैदा किए जाएं कि ये गंगा जमुनी ज़बान सिर्फ मुसलमानों की ज़बान बनकर रह जाए.
- गुलज़ार देहलवी
मिटती हुई दिल्ली के निशां हैं हम लोग
ढूंढोंगे कोई दिन में कहां हैं हम लोग
गुलज़ार अबरू-ए-ज़बां अब हमीं से है
दिल्ली में अपने बाद ये लुत्फ़-ए-सुख़न कहां
तारीख़ अब जो होगी मुरत्तब ज़बान की
गुलज़ार देहलवी को भुलाया न जाएगा
गुलज़ार देहलवी उस तहज़ीब का प्रतिनिधित्व करते थे जिसमें हमारे समय की नफ़रत, घृणा और कट्टरता नहीं थी. गुलज़ार के लिए सामाजिक और राजनीतिक सौहार्द से बड़ी कोई चीज शायद थी ही नहीं. वो अपनी नज़्मों से भी हमेशा शांति, एकता और भाईचारे का ही संदेश देते रहे. ऐसे में जब-जब दिल्ली की तहज़ीब और ज़बान की बात आएगी उनका नाम लिया जाएगा और उनके ये शेर ख़ास तौर पर दर्ज किए जाएंगे!
पंडित आनंद मोहन ज़ुत्शी ‘गुलज़ार देहलवी’ (1925-2020) देहली बाज़ार, सीताराम, पुरानी दिल्ली के गली कश्मीरियान में पंडित त्रिभुवन नाथ ज़ुत्शी ‘ज़ार देहलवी’ और बृज रानी ज़ुत्शी ‘बेज़ार देहलवी’ उर्फ विक्टोरिया ज़ुत्शी के घर जन्मे.पिता ज़ार देहलवी, दाग़ देहलवी के पहले शागिर्द थे; जो अंग्रेजी, संस्कृत और फारसी समेत कई भाषाओं के विद्वान होने के अलावा इस्लामियात, वेदांत और गणित की गहरी जानकारी रखते थे.वो सेवानिवृत्त के बाद भी 39 साल तक इंद्रप्रस्थ कॉलेज फॉर वूमेन में पढ़ाते रहे, जहां चर्चित फिक्शन राइटर कुर्रतुलऐन हैदर और जानी-मानी शायरा अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा भी उनकी स्टूडेंट रहीं. यूं समझें कि पिता को दाग़ से निस्बत थी, वही दाग़ जो ज़बान का मालिक था. कहते हैं दिल्ली की लिंग्विस्टिक्स हिस्ट्री में सबसे ऑथेंटिक टकसाली ज़बान दाग़ की थी.
जब गुलज़ार देहलवी सिर्फ 13-14 बरस के थे तब बाबा-ए-उर्दू मौलवी अब्दुल हक़ ने कहा था-अपने बुज़ुर्गों की तरह फ़सीह (Eloquent) उर्दू लिखता और बोलता है और ये तो हम जैसों का देखा-भाला है कि गुलज़ार जब बोलने पर आते थे तो पर्यायवाची शब्दों का ढेर लगा देते थे. हालांकि वो ख़ुद अपने ज़माने में ‘जोश’ को ज़बान का सबसे बड़ा उस्ताद बताते थे. ये और बात है कि जोश भी इनके क़ायल थे..
वहीं, मां ‘बेज़ार’ की बात करें तो वो साइल देहलवी जैसे शायर की शागिर्द थीं. उनके बारे में कहा जाता था कि अगर देहली की औरतों की टकसाली ज़बान सुनना हो तो इस पंडिताइन से सुनो.
ये बात भी मशहूर थी कि अगर दिल्ली आकर गुलज़ार की वालिदा से नहीं मिले तो दिल्ली ही नहीं देखी.
दरअसल दिल्ली की तहज़ीब गुलज़ार साहब के लालन-पालन का हिस्सा थी. वो तमाम धर्मों से परिचित थे. गीता, बाइबिल क़ुरान और जाने क्या-क्या पढ़ रखा था.
संस्कृत के श्लोक के अलावा वो इस रवानी से क़ुरान की आयतें सुनाते थे कि कई बार उनको मुसलमान समझ लिया जाता था. वो जमीयत उलेमा-ए-हिंद की बैठकों में भी इस तरह शरीक होते थे कि लोगों ने उनको ‘शायर-ए- जमीयत’ कहना शुरू कर दिया था
उनकी शेरवानी में मोतियों की एक ख़ास लड़ी होती थी जिसके लॉकेट में गीता का श्लोक और क़ुरान की आयतें दर्ज थीं.
इसी तरह रमज़ान में ‘रोज़ा रवादारी’ हो या रामलीला कमेटी, दरगाह हज़रत निज़ामुद्दीन और फूल वालों की सैर आदि से उनका रिश्ता… यूं कहें कि धर्मनिरपेक्षता अगर सचमुच कोई चीज होती है तो गुलज़ार साहब उसके अमानतदार थे. उन्होंने कहा भी कि-
मैं वो हिंदू हूं कि नाजां हैं मुसलमां जिस पर
दिल में काबा है मिरे दिल है सनम-ख़ानों में
‘जोश’ का क़ौल है और अपना अक़ीदा गुलज़ार
हम सा काफ़िर न उठा कोई मुस्लमानों में
Some Interesting Facts:
- 1933 से ही वो दिल्ली के मुशायरों में भी शरीक होने लगे थे. जहां अपने वक़्त के तमाम बड़े शायरों, साहित्यकारों और क़द्दावर रहनुमाओं के साथ उनका उठना-बैठना रहा.
- जवाहरलाल नेहरू की ख़्वाहिश पर 1951 के वर्ल्ड पीस फेस्टिवल बर्लिन (जर्मनी) में युवा कवियों की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में शामिल हुए और दूसरा अवार्ड (Youth Poet Laureate) हासिल किया.
- साल 2000 में आयोजित संयुक्त राष्ट्र के 36 देशों के शायरों की कॉन्फ्रेंस में भारत का प्रतिनिधित्व और उसकी अध्यक्षता भी गुलज़ार ने की.
- गुलज़ार ऐसी तमाम उपलब्धियों से आगे ज़बान के शायर थे, इसलिए उनकी शायरी को एक ख़ास तरह से देखते हुए कहा जा सकता है कि वो सिर्फ शायर नहीं थे बल्कि हिंदुस्तानी तहज़ीब की साझी विरासत और परंपरा के संरक्षक के तौर पर उनका योगदान अतुलनीय है.
- उर्दू में इंक़लाबी नज़्में कहने वाले गुलज़ार शायरी में अपनी बड़ी पहचान नहीं बना सके. लेकिन ये भी एक किस्सा है कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ उनके नज़्मों की पहली किताब ‘ललकार’ ज़ब्त कर ली गई थी. जिसको उर्दू दैनिक ‘तेज’ के मालिक लाला देशबंधु गुप्ता ने छापा था.
- एक दिलचस्प बात ये है कि उनकी शायरी के अंदाज़ को देखते हुए माता-पिता और भाई के ज़ार (रोना), बेज़ार (उकताया हुआ) और ख़ार (कांटा) जैसे नकारात्मक अर्थ वाले नामों की मौजूदगी में इनका नाम गुलज़ार (गुलाबों का बिस्तर) रखा गया.
- कांग्रेस के साप्ताहिक ‘स्टूडेंट्स कॉल’ और हिंदू कॉलेज मैगज़ीन के संपादक रहे.
- भारत सरकार के वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की तरफ़ से 1975 में शुरू की गई विज्ञान और प्रौद्योगिकी को समर्पित पहली उर्दू पत्रिका ‘साइंस की दुनिया’ के संस्थापक संपादक हुए और यहीं से डायरेक्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए.

