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हिंदी साहित्य में व्यंग की विधा

व्यंग जीवन से साक्षात्कार  करता है साथ ही विसंगतियों अत्याचारों का पर्दाफास करता है

- हरिशंकर परसाई


समाज की विसंगतियों जाती -भेद, हिन्दू-मुसलमान के धर्माडंबर  गरीबी-अमीरी,रूढ़िवादिता आदि को दुनिया के समक्ष उजागर करने के लिए साहित्य की इस विधा व्यंग का सरारा लिया जाता है | हरिशंकर परसाई को पहले रचनाकार के रूप में देखा जाता है जिन्होंने व्यंग को २०वीं सदी में विधा का दर्जा दिलाने का श्रेय प्राप्त है | हांलाकि इस श्रेष्ठ शैली का प्रारम्भ मध्यकाल से ही देखने को मिलता है ,जब समाज की विसंगतियों पर व्यंगपूर्ण शैली से कबीर द्वारा प्रहार किया जाता था| कबीर ने अपने काल में धार्मिक आडम्बरो, अंधविश्वासों को उजागर करने के लिए कई वयांगनात्मक रचनायें रची| 


पहन पूजै हरी मिले तो पुजू पहाड़ टाट यह चली भली पीस खाये पहर 

-कबीर


काकर पाथर जोरि के मस्जिद लायी बनाये 

ता चढ़ी मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ सुदाया 

-कबीर


 यहाँ  संत कबीर ने दोनों ही धर्मो पर कटाक्ष किया है | सुप्रसिद्ध व्यंगकार हरिशंकर परसाई का मानना था की व्यंग जीवन से साक्षात्कार  करता है साथ ही विसंगतियों अत्याचारों का पर्दाफास करता है | 


दिवस कमजोर का मनाया जाता है, जैसे महिला दिवस, अध्यापक दिवस, मजदूर दिवस। कभी थानेदार दिवस नहीं मनाया जाता।

- हरिशंकर परसाई


एक व्यंगकार व्यक्ति जीवन की समस्यायों का एक ऐसा रेखा चित्र खींचता है ,

जिसे पढ़ कर एक चेतना पाठक अपने आप से भी सवाल उठाने पर विवश हो जाता है | 

- हरिशंकर परसाई


परसाई के साथ कई उम्दा लेखकों ने भी कई पीढ़ियों से लेखन की इस शैली में अपना योगदान दिया है | शंकर पुणतान्वेकर ,नेन्द्र कोहली ,गोपाल चतुर्वेदी विष्णुनागर ,प्रेम गणमेवाया आदि ऐसे ही प्रसिद्ध व्यंगकार हैं | 

इनके साथ प्रेमचंद भी इस सैली के कवियों में विद्यमान हैं | उनके द्वारा लिखा "मोटा राम जी शास्त्री" एक व्यंग कथा है जो बहुत प्रसिद्ध है | 

इसने साहित्य को एक अलग रूप देने का कार्य किया हालांकि ,इसे मनोरंजनात्मक रूप से देखा जाता है | 

आज के समय में एक बहुत समूह व्यंग लेखन से जुड़ चूका है | पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग सामग्री को मुख्य स्थान मिलता है जो साथ ही आज के ज़रूरत बन चूका है | हालांकि व्यंग पुस्तकों का उतना प्रकाशन नहीं किया जाता है|पर लोगो की उसके प्रति रूचि को देखते हुए पत्रिकाओं में डाला जाता है |




आइये ऐसे ही कुछ व्यंग्यकार को जाने 


भरते हैं मेरी आह को ग्रामोफ़ोन में,

कहते हैं फ़ीस लीजिये और आह कीजिये 

- 'अकबर' इलाहाबादी

शरद जोशी


अपनी उच्च परंपरा के लिए संस्कृत, देश की एकता के लिए मराठी या बंगला, अपनी बात कहने समझने के लिए हिंदी और इस पापी पेट की खातिर अंग्रेजी जानना जरूरी है

-शरद जोशी


जो लिखेगा सो दिखेगा, जो दिखेगा सो बिकेगा-यही जीवन का मूल मंत्र है

 -शरद जोशी


२१ मई १९३१ को उज्जैन , मध्यप्रदेश में जन्मे शरद जोशी  हिंदी के सुप्रसिद्ध व्यंगकार हैं | उनका लेखनी के प्रति इनका इतना लगाव था कि इन्होने मध्य प्रदेश सरकार के सुचना एवं प्रकाशन विभाग की नौकरी को छोड़ दी थी |आपको बतादें  धारावाहिक "लाजपतगंज" भी इन्ही की कहानियों पर आधारित थी| बता दें १९९० में योगदान के लिए इन्हे पद्मा श्री सम्मान प्रदान किया गया था | वहीं ५ सितम्बर १९९१ को मुंबई में सम्मानित व्यंगकार शरद जोशी का निधन हो गया| 


व्यंग संग्रह : परिक्रमा ,रहा किनारे बैठ , मेरी श्रेष्ठ व्यंग रचनाएं ,किसी बहाने 

धारावाहिक लेखन : पायलय में तूफान , दाने अनार के , ये दुनिया गजब की, ये जो है जिंदगी


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