[Kavishala Labs]समकालीन हिंदी कवियों में वीरेन डंगवाल की एक विशेष पहचान रही है. उन्होंने अपनी रचनाओं में यथार्थ को बड़े ही अनूठे ढंग से प्रस्तुत किया है. समाज के वंचित वर्ग और आम आदमी के संघर्ष की वास्तविक दशा का चित्रण वीरेन डंगवाल की कविताओं में देखने को मिलता है.
वीरेन डंगवाल (५ अगस्त १९४७ - २८ सितंबर २०१५)हिंदी के कवि, कहानीकार व लेखक थे. उनका जन्म टेहरी गढ़वाल, उत्तराखंड में हुआ था. उन्होंने मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, कानपुर, बरेली, नैनीताल और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की. उन्होंने हिंदी साहित्य की पद्य व गद्य दोनों विधाओं में श्रेष्ठ कृतियों की रचना की है.
वीरेन डंगवाल की काव्य प्रतिभा विलक्षण थी. उन्होंने अपनी रचनाओं में वैदिक प्रतीकों का भी प्रयोग किया है. और साथ ही साधारण से प्रतीत होने वाले वस्तुओं व प्रतीकों का भी प्रयोग किया है. उनकी तीक्ष्ण दृस्टि साधारण सी दिखनी वाली घटनाओ व वस्तुओं में भी गूढ़ रहस्य खोज लेती थी. देखिये उनकी काव्य प्रतिभा की एक बानगी
इतने भले नहीं बन जाना साथी
जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी
गदहा बनने में लगा दी अपनी सारी कुव्वत सारी प्रतिभा
किसी से कुछ लिया नहीं न किसी को कुछ दिया
ऐसा भी जिया जीवन तो क्या जिया?
इतने दुर्गम मत बन जाना
सम्भव ही रह जाय न तुम तक कोई राह बनाना
अपने ऊंचे सन्नाटे में सर धुनते रह गए
लेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना
वीरेन डंगवाल की रचनाओं में हास्य, कटाक्ष व व्यंग्य का भाव दृष्टिगोचर होता है. उन्होंने राजनीति, सामाजिक अव्यवस्था, सरकारी उदासीनता पर अपनी रचनाओं के जरिये प्रहार किया है. उन्होंने असामनता, अव्यवस्था व धूर्तता का निर्भीकता से विरोध किया. वीरेन डंगवाल की खास खूबी यह थी की वे हर एक घटना या क्रिया की बारीकी से पड़ताल करते थे. और फिर उसे अपनी रचनाओं में गढ़ते थे. उन्होंने पत्रकारिता भी की थी. लिहाजा उन्हें पत्रकारिता के सन्दर्भ में अच्छी जानकारी थी. अधिकांश पत्रकारों व सम्पादकों के लिए 'घटनाएं, मौतें और आपदाएं" आंकड़े मात्र हैं. जितनी बड़ी घटना उतना बड़ा अवसर यही अधिकांश पत्रकारों की मानसिकता होती है. उन्होंने अपनी कविता में पत्रकारिता के सन्दर्भ में जिक्र करते हुए लिखा
'इतने मरे'
यह थी सबसे आम, सबसे ख़ास ख़बर
छापी भी जाती थी
सबसे चाव से
जितना खू़न सोखता था
उतना ही भारी होता था
अख़बार।
वीरेन डंगवाल ने हिंदी साहित्य में अभूतपूर्व योगदान दिया. उनकी कविताओं का अनुवाद बाँग्ला, मराठी, पंजाबी, अंग्रेज़ी, मलयालम और उड़िया जैसी भाषाओं में प्रकाशित हुआ है. वीरेन डंगवाल का पहला कविता संग्रह ४३ वर्ष की उम्र में आया. इसी दुनिया में नामक इस संकलन को रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार (१९९२) तथा श्रीकान्त वर्मा स्मृति पुरस्कार (१९९३) से नवाज़ा गया. उनके दूसरे संकलन 'दुष्चक्र में सृष्टा' के लिए उन्हें २००४ का साहित्य अकादमी पुरस्कार भी दिया गया. समकालीन हिंदी कविता स्तम्भ कवियों में वीरेन डंगवाल का नाम शामिल है. पढ़िए उनकी कुछ कविताएं.
[१]
मैं ग्रीष्म की तेजस्विता हूँ
और गुठली जैसा
छिपा शरद का उष्म ताप
मैं हूँ वसन्त में सुखद अकेलापन
जेब में गहरी पड़ी मूंगफली को छाँट कर
चबाता फ़ुरसत से
मैं चेकदार कपड़े की कमीज़ हूँ
उमड़ते हुए बादल जब रगड़ खाते हैं
तब मैं उनका मुखर गुस्सा हूँ
इच्छाएँ आती हैं तरह-तरह के बाने धरे
उनके पास मेरी हर ज़रूरत दर्ज है
एक फ़ेहरिस्त में मेरी हर कमज़ोरी
उन्हें यह तक मालूम है
कि कब मैं चुप हो कर गरदन लटका लूँगा
मगर फिर भी मैं जाता रहूँगा ही
हर बार भाषा को रस्से की तरह थामे
साथियों के रास्ते पर
एक कवि और कर ही क्या सकता है
सही बने रहने की कोशिश के सिवा ।
मैं हूँ रेत की अस्फुट फुसफुसाहट
बनती हुई इमारत से आती ईंटों की खरी आवाज़
मैं पपीते का बीज हूँ
अपने से भी कई गुना मोटे पपीतों को
अपने भीतर छुपाए
नाजुक ख़याल की तरह
हज़ार जुल्मों से सताए मेरे लोगो !
मैं तुम्हारी बद्दुआ हूँ
सघन अंधेरे में तनिक दूर पर झिलमिलाती
तुम्हारी लालसा
गूदड़ कपड़ों का ढेर हूँ मैं
मुझे छाँटो
तुम्हें भी प्यारा लगने लगूँगा मैं एक दिन
उस लालटेन की तरह
जिसकी रोशनी में
मन लगाकर पढ़ रहा है
तुम्हारा बेटा ।
[२]
आतंक सरीखी बिछी हुई हर ओर बर्फ़
है हवा कठिन, हड्डी-हड्डी को ठिठुराती
आकाश उगलता अन्धकार फिर एक बार
संशय विदीर्ण आत्मा राम की अकुलाती
होगा वह समर, अभी होगा कुछ और बार
तब कहीं मेघ ये छिन्न -भिन्न हो पाएँगे
तहखानों से निकले मोटे-मोटे चूहे
जो लाशों की बदबू फैलाते घूम रहे
हैं कुतर रहे पुरखों की सारी तस्वीरें
चीं-चीं, चिक-चिक की धूम मचाते घूम रहे
पर डरो नहीं, चूहे आखिर चूहे ही हैं
जीवन की महिमा नष्ट नहीं कर पाएँगे
यह रक्तपात यह मारकाट जो मची हुई
लोगों के दिल भरमा देने का ज़रिया है
जो अड़ा हुआ है हमें डराता रस्ते पर
लपटें लेता घनघोर आग का दरिया है
सूखे चेहरे बच्चों के उनकी तरल हँसी
हम याद रखेंगे, पार उसे कर जाएँगे
मैं नहीं तसल्ली झूठ-मूठ की देता हूँ
हर सपने के पीछे सच्चाई होती है
हर दौर कभी तो ख़त्म हुआ ही करता है
हर कठिनाई कुछ राह दिखा ही देती है
आए हैं जब चलकर इतने लाख बरस
इसके आगे भी चलते ही जाएँगे
आएँगे उजले दिन ज़रूर आएँगे
[३]
पहले उस ने हमारी स्मृति पर डंडे बरसाए
और कहा - 'असल में यह तुम्हारी स्मृति है'
फिर उस ने हमारे विवेक को सुन्न किया
और कहा - 'अब जा कर हुए तुम विवेकवान'
फिर उस ने हमारी आंखों पर पट्टी बांधी
और कहा - 'चलो अब उपनिषद पढो'
फिर उस ने अपनी सजी हुई डोंगी हमारे रक्त की
नदी में उतार दी
और कहा - 'अब अपनी तो यही है परंपरा है

