[Kavishala Labs] हिंदी साहित्य को नया आयाम देने में महादेवी वर्मा का विशेष योगदान हैं. उन्होंने हिंदी काव्य व गद्य में हृदयी स्पर्शी व सारगर्भित रचनाएं रची हैं. महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य के छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं. उनकी कविताओं में विरह, वेदना, प्रेम, श्रृंगार आदि का भाव परिलक्षित होता है.


महादेवी वर्मा (26 मार्च 1907 -11 सितंबर 1987) हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवियित्री थी. आधुनिक हिन्दी की सबसे सशक्त कवयित्रियों में से एक होने के कारण उन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी जाना जाता है. कवि निराला ने उन्हें “हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती” भी कहा है. महादेवी वर्मा उन कवियों में से एक हैं जिन्होंने व्यापक समाज में काम करते हुए देश की समस्याओं को देखा, परखा और करुण होकर अन्धकार को दूर करने वाली दृष्टि देने की कोशिश की. न केवल उनका काव्य बल्कि महादेवी वर्मा के सामाज सुधार के कार्य और महिलाओं के प्रति चेतना भावना भी इस दृष्टि से प्रभावित रही. उन्होंने मन के विषाद को इतने स्नेह और शृंगार से सजाया कि दीपशिखा में वह जन-जन की पीड़ा के रूप में स्थापित हुई और उसने केवल पाठकों को ही नहीं समीक्षकों को भी गहराई तक प्रभावित किया.


महादेवी वर्मा की रचनाओं में विरह, वेदना, विछोह, प्रणय , मानवीय संवेदना का समावेश है. भक्ति काल में जो स्थान कृष्ण भक्त मीरा को प्राप्त है, आधुनिक काल में वह स्थान महादेवी वर्मा को मिला है जहाँ एक ओर मीरा के प्रियतम सगुण, साकार गिरधर गोपाल है जिसके प्रति वे समर्पित रही, तो दूसरी ओर महादेवी के प्रियतम असीम निर्गुण निराकार (ब्रह्म) हैं और उसके प्रति वे समर्पित हैं. महादेवी की रचनाओं में भी मीरा की तरह ही प्रेम और विरह देखने को मिलता है. महादेवी अपने आप में एक जीवन गाथा हैं. उनकी कविता मैं नीर भरी दुःख की बदली उनकी विरह वेदना को दर्शाती है- 


मैं नीर भरी दुख की बदली!

स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा

क्रन्दन में आहत विश्व हँसा

नयनों में दीपक से जलते,

पलकों में निर्झारिणी मचली!


महादेवी वर्मा ने लेखन, संपादन और अध्यापन का कार्य भी किया. उन्होंने इलाहाबाद (प्रयागराज) में प्रयाग महिला विद्यापीठ के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया. यह कार्य उस समय महिला-शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम था. उन्होंने गद्य, काव्य, शिक्षा और चित्रकला सभी क्षेत्रों में नए आयाम स्थापित किये. इसके अतिरिक्त उनकी 18 काव्य और गद्य कृतियां हैं जिनमें मेरा परिवार, स्मृति की रेखाएं, पथ के साथी, शृंखला की कड़ियाँ और अतीत के चलचित्र प्रमुख हैं. महादेवी वर्मा का जीवन दर्शन "मिलन-विरह" को दर्शाता है. उन्होंने विरह-वेदना को मानव का प्रारब्भ माना है . उनकी कविता "जीवन विरह का जलजात" में इसकी झलक मिलती है -


काल इसको दे गया पल-आँसुओं का हार

पूछता इसकी कथा नि:श्वास ही में वात;

जीवन विरह का जलजात!


जो तुम्हारा हो सके लीला-कमल यह आज,

खिल उठे निरुपम तुम्हारी देख स्मित का प्रात;

जीवन विरह का जलजात!


हिंदी साहित्य में महादेवी वर्मा द्वारा दिए गए योगदान के लिए उन्हें 1934 - में सेकसरिया पुरस्कार 1942 - द्विवेदी पदक 1943 - मंगला प्रसाद पुरस्कार 1943 - भारत भारती पुरस्कार 1956 - पद्म भूषण 1979 - साहित्य अकादमी फेलोशिप 1982 - ज्ञानपीठ पुरस्कार तथा 1988 - पद्म विभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया. हिंदी पद्य व गद्य साहित्य में उनके द्वारा रचित रचनाएं सदैव नए साहित्यकारों का मार्ग प्रशस्त करती रहेंगी. पढ़िए महादेवी वर्मा की कुछ कविताएं -


[१]

 

जो तुम आ जाते एक बार


कितनी करूणा कितने संदेश

पथ में बिछ जाते बन पराग

गाता प्राणों का तार तार

अनुराग भरा उन्माद राग


आँसू लेते वे पथ पखार

जो तुम आ जाते एक बार


हँस उठते पल में आर्द्र नयन

धुल जाता होठों से विषाद

छा जाता जीवन में बसंत

लुट जाता चिर संचित विराग


आँखें देतीं सर्वस्व वार

जो तुम आ जाते एक बार


[२]

मै अनंत पथ में लिखती जो

सस्मित सपनों की बाते

उनको कभी न धो पायेंगी

अपने आँसू से रातें!


उड़् उड़ कर जो धूल करेगी

मेघों का नभ में अभिषेक

अमिट रहेगी उसके अंचल-

में मेरी पीड़ा की रेख!


तारों में प्रतिबिम्बित हो

मुस्कायेंगी अनंत आँखें,

हो कर सीमाहीन, शून्य में

मँडरायेगी अभिलाषें!


वीणा होगी मूक बजाने-

वाला होगा अंतर्धान,

विस्मृति के चरणों पर आ कर

लौटेंगे सौ सौ निर्वाण!


जब असीम से हो जायेगा

मेरी लघु सीमा का मेल,

देखोगे तुम देव! अमरता

खेलेगी मिटने का खेल!


[३]

वे मुस्काते फूल, नहीं

जिनको आता है मुर्झाना,

वे तारों के दीप, नहीं

जिनको भाता है बुझ जाना


वे नीलम के मेघ, नहीं

जिनको है घुल जाने की चाह

वह अनन्त रितुराज,नहीं

जिसने देखी जाने की राह|

वे सूने से नयन,नहीं

जिनमें बनते आँसू मोती,

वह प्राणों की सेज,नही

जिसमें बेसुध पीड़ा सोती;


ऐसा तेरा लोक, वेदना

नहीं,नहीं जिसमें अवसाद,

जलना जाना नहीं, नहीं

जिसने जाना मिटने का स्वाद !

क्या अमरों का लोक मिलेगा

तेरी करुणा का उपहार?

रहने दो हे देव! अरे

यह मेरा मिटने का अधिकार !