अभिव्यक्ति ने तो आकाश को छुआ है
किन्तु जीवन धरती से चिपटा हुआ है;
कितना अंतर है मेरे दोनों रूपों में,
एक राजहंस तो दूसरा कछुआ है.
[Kavishala Labs] यह कविता लिखी है गुलाब खंडेलवाल ने. गुलाब खंडेलवाल की रचनाओं में दर्शन, अध्यात्मवाद, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण आदि का समावेश है. उन्होंने हिंदी काव्य व अन्य भाषाओँ की काव्य विधाओं में कई रचनाएं रची है. उनका रचना क्षेत्र विस्तृत रहा है. वे "महाकवि" गुलाब खंडेलवाल के नाम से मशहूर हैं.
महाकवि गुलाब खंडेलवाल ( २१ फ़रवरी सन् १९२४ - ०२ जुलाई २०१७)-का जन्म राजस्थान के शेखावाटी प्रदेश के नवलगढ़ नगर में हुआ था. उनके पूर्वज राजस्थान के मंडावा से बिहार के गया में आकर बस गये थे. कालान्तर में गुलाबजी प्रतापगढ़, उ.प्र. में कुछ वर्ष बिताने के पश्चात अमेरिका के ओहियो में निवास करने लगे.
गुलाब खंडेलवाल के अंदर कविता के प्रति बचपन से लगन थी.अपने काशीवास के दौरान वे बेढब बनारसी के सम्पर्क में आये तथा उस समय के साहित्य महारथियों के निकट आने लगे. आयु कम होने पर भी उस समय के साहित्यकारों की एकमात्र संस्था प्रसाद-परिषद के सदस्य बना लिये गये जिससे उनमें कविता के संस्कार पल्लवित हुए.
गुलाब जी की कविताओं में अध्यात्म व दर्शन की छाप देखने को मिलती है. उन्होंने अपनी रचनाओं में पौराणिक कहानियों व घटनाओं का विश्लेषण किया है. वे लीक से हटकर रचना करने वाले साहित्यकार थें. उनका मानना था की किसी भी चीज को सिर्फ इसलिए स्वीकार कर लेना उचित नहीं की उसे धार्मिक मान्यता मिली हुई है. उन्होंने घटनाओं या मान्यताओं को अपनी बुद्धि से परखा और प्रश्न किया. देखिये एक बानगी-
मेरा मस्तक लज्जा से झुक जाता है
जब कोई मुझसे कहता है
कि तेरा पिता
जो सात आसमानों के ऊपर रहता है
इतना छोटा कैसे हो गया था
कि अपनी सृष्टि नापने के लिए
उसे दो पग चलना पड़ा!
एक भोले-भाले भक्त को छलना पड़ा!
बहुरुपिए की तरह रूप बदलना पड़ा!
गुलाब खंडेलवाल का रचना संसार विस्तृत रहा है. उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में विशेष योगदान दिया है.गुलाब जी ने न सिर्फ़ उत्कृष्ट साहित्य की रचना ही की है बल्कि आनेवाली पीढ़ियों मार्ग भी प्रशस्त किया है. वे काव्य की अनेक विधाओं के प्रथम प्रणेता रहे हैं. उन्होंने दोहा, कविता, गीति काव्य, गीति नाट्य, ग़ज़ल व सॉनेट आदि अन्य काव्य विधाओं में रचनाएं रची हैं.
गुलाब जी की काव्य कुशलता से कई श्रेष्ठ साहित्यकार प्रभावित थें. सुविख्यात कवि -हरिवंश राय बच्चन ने गुलाब खंडेलवाल के लिए कहा था कि , "लगता है, विधाता ने मेरे हृदय का ही एक टुकड़ा तुम्हारे हृदय में रख दिया है. मैंने ’कविता’ को उन संग्रहों में रख दिया है जिन्हें मैं फिर-फिर देखना चाहता हूँ. "
महादेवी वर्मा ने गुलाब जी के बारे लिखा है कि, -आपके(गुलाब खंडेलवाल के) साथ हिन्दीवालों ने न्याय नहीं किया!" उनके काव्य-पाठ को सुनकर वे बोलीं, "मेरे आँखों के सम्मुख एक-एक कर चित्र आते जा रहे थे"
मैथिलीशरण गुप्त ने गुलाब खंडेलवाल के लिए कहा था कि "आप जन्मजात कवि हैं. ’बलि-निर्वास’ की प्रथम पंक्ति ही ’यदि स्वर्ग कहीं है तो वह मेरे ही उर में है’ आपकी अद्भुत प्रतिभा का परिचय देती है. तथा ’पद-विन्यासमात्रेण’ की उक्ति को चरितार्थ करती है"
गुलाब खंडेलवाल ने हिंदी साहित्य को न केवल समृद्ध किया बल्कि नए साहित्यकारों का मार्ग भी प्रशस्त किया है. हिंदी साहित्य में उनका योगदान अविस्मरणीय है. पढ़िए उनकी कुछ रचनाएं -[१]
धरती में गड़ा बीज चिल्लाया--
'मुझे अँधेरे से प्रकाश में आने दो,
खुली हवा के झोंके खाने दो,
मुझे चाहिये फूल की-सी कोमल काया.'
डाल पर खिला फूल बुदबुदाया--
'अस्तित्व पीड़ा है, दंशन है,
इसकी आकांक्षा पागलपन है,
मूढ़! यह कुविचार तुझे किसने सुझाया?'
इतने में वर्षा का झोंका आया
बीज अंकुर बन कर फूट गया,
फूल अपनी डाल से टूट गया,
जीवन का रहस्य कोई जान नहीं पाया.
[२]
आकाश का यह कौन-सा किनारा है
जहाँ न सूरज है, न चाँद है, न तारा है!
चारों ओर एक नीला विस्तार है,
जिसमें से निकलने का न कोई छिद्र है, न कोई द्वार है.
यहाँ मेरा अस्तित्व है केवल मैं नहीं हूँ,
अथवा कुछ भी नहीं है और,
मैं-ही-मैं सब कहीं हूँ.
[३]
तू एक शक्ति है यह तो निर्विवाद है,
प्रश्न तो यह है कि चेतन मुझ जैसा ही
तेरा भी अपना व्यक्तित्व कोई है या नहीं
और यदि है तो फिर
क्या कभी करता हमें भी तू याद है.
'हँसना कभी, रोना कभी,
पाना कभी, खोना कभी,
देखना, सुनना, समझना, अनुभव करना,
जगना और सोना कभी'
क्या यह स्वतंत्रता का सुख तुझे प्राप्त है?
अथवा चिर-अटल, अकाट्य, चिर अलिप्त तू,
एक महाशक्ति-स्रोत अणु-अणु में व्याप्त है?
तेरा यदि कोई व्यक्तित्व नहीं है तो फिर
अपना अहम् हम किसके साथ जोड़ें?
प्रेम भी किससे करें
डरें तो किससे डरें?
किसे फिर ग्रहण करें
और किसे छोड़ें?
जाने दे किन्तु अब तू
जो कुछ है, जैसा है,
मेरे पास आना है तो भक्ति बनके आ.
कृष्ण बन, राधा बन,
पूरा या आधा बन,
जीवन की कोई अभिव्यक्ति बनके आ.
तुझ-सा ही शून्य बनूँ मैं भी--
यह तो है कल की बात,आज तू मेरी तरह व्यक्ति बनके आ.
क

