[Kavishala Labs] साहित्य का मूल उद्देश्य होता है समाज में व्याप्त विसंगतियों पर प्रहार कर उनका सुधार करना. साहित्य की विभिन्न विधाओं में विभिन्न साहित्यकारों ने समय समय पर अपनी रचनाओं से सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व धार्मिक विसंगति व अव्यवस्था पर तीक्ष्ण प्रहार किया है. सभ्य समाज की नींव रखने में साहित्यकारों का अतुलनीय योगदान रहा है. ओमप्रकाश वाल्‍मीकि ऐसे ही समकालीन साहित्यकारों में से एक थे जिन्होंने समाज में जाति, वर्ग के नाम पर भेदभाव की अव्यवस्था के खिलाफ अपनी लेखनी चलाई.


ओमप्रकाश वाल्मीकि (30 जून 1950 - 17 नवम्बर 2013) हिंदी के लेखक व कवि थे. उन्हें वर्तमान दलित साहित्य के प्रतिनिधि रचनाकारों में से एक माना जाता है. हिंदी में दलित साहित्य के विकास में ओमप्रकाश वाल्मीकि की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है. ओमप्रकाश वाल्मीकि का बचपन सामाजिक एवं आर्थिक कठिनाइयों में बीता. जीवन में उन्हें जिन आर्थिक, सामाजिक और मानसिक समस्याओं से जूझना पड़ा, उसकी झलक उनके साहित्य में देखने को मिलती है.


ओमप्रकाश वाल्मीकि उन शीर्ष साहित्यकारों में से एक हैं जिन्होंने अपने सृजन से साहित्य में सम्मान व स्थान पाया है. उन्होंने कविता, कहानी, आ्त्मकथा व आलोचनात्मक लेखन भी किया है. उन्होंने जाति-वर्ग के अनुसार मुंह देखा व्यवहार करने वाले समाज पर अपनी रचनाओं से करारा तंज कसा है. ओमप्रकाश वाल्मीकि सामाजिक व आर्थिक असमानता के विरोधी थे. आर्थिक रूप से संपन्न लोगो द्वारा गरीबो का शोषण, जाति-वर्ग के नाम पर भेदभाव आदि सामाजिक विसंगतियों के खिलाफ उन्होंने अपनी लेखनी चलाई. वे लिखते है,


जब भी देखता हूँ मैं

झाड़ू या गन्दगी से भरी बाल्टी

कनस्तर

किसी हाथ में

मेरी रगों में

दहकने लगते हैं

यातनाओं के कई हज़ार वर्ष एक साथ

जो फैले हैं इस धरती पर

ठंडे रेत-कणों की तरह

वे तमाम वर्ष

वृत्ताकार होकर घूमते हैं

करते हैं छलनी लगातार

उँगलियों और हथेलियों को

नस-नस में समा जाता है ठंडा ताप

  

ओमप्रकाश वाल्मीकि के अनुसार दलितों द्वारा लिखा जाने वाला साहित्य ही दलित साहित्य है. उनकी मान्यतानुसार दलित ही दलित की पीडा़ को बेहतर ढंग से समझ सकता है और वही उस अनुभव की प्रामाणिक अभिव्यक्ति कर सकता है. इस आशय की पुष्टि के तौर पर अपनी आत्मकथा जूठन. में उन्होंने वंचित वर्ग की समस्याओं पर ध्यान आकृष्ट किया है. ओमप्रकाश वाल्मीकि का मानना है जब तक हम स्वयं कोई दुःख या पीड़ा अनुभव नहीं करते तब तक हम उस वेदना की वास्तविक अभिव्यक्ति नहीं कर सकते. वे अपनी कविता में लिखते है,- 


ठंडे कमरों में बैठकर

पसीने पर लिखना कविता

ठीक वैसा ही है

जैसे राजधानी में उगाना फ़सल

कोरे काग़ज़ों पर. 

फ़सल हो या कविता

पसीने की पहचान है दोनों ही.


साहित्य के क्षेत्र में ओमप्रकाश वाल्मीकि 1997 में प्रकाशित अपनी आत्मकथा ‘जूठन’ से चर्चित और स्थापित हुए. उनकी आत्मकथा से यह ज्ञात होता है कि किस तरह वीभत्स उत्पीड़न के बीच एक दलित रचनाकार की चेतना का निर्माण और विकास होता है. साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें सन् 1993 में डॉ॰ अंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार, सन् 1995 में परिवेश सम्मान, न्यू इंडिया बुक पुरस्कार 2004, कथाक्रम सम्मान 2001, 8वां विश्व हिंदी सम्मलेन 2006 न्यूयोर्क, अमेरिका सम्मान और साहित्यभूषण पुरस्कार (2008-2009) से अलंकृत किया जा चुका है. 

पढ़िए उनकी कुछ कविताएं


[१]

कविता और फसल 


ठंडे कमरों में बैठकर

पसीने पर लिखना कविता

ठीक वैसा ही है

जैसे राजधानी में उगाना फ़सल

कोरे काग़ज़ों पर ।


फ़सल हो या कविता

पसीने की पहचान है दोनों ही ।


बिना पसीने की फ़सल

या कविता

बेमानी है

आदमी के विरूद्ध

आदमी का षडयंत्र--

अंधे गहरे समंदर सरीखा

जिसकी तलहटी में

असंख्‍य हाथ

नाख़ूनों को तेज़ कर रहे हैं

पोंछ रहे हैं उँगलियों पर लगे

ताज़ा रक्‍त के धब्‍बे ।


धब्‍बे : जिनका स्‍वर नहीं पहुँचता

वातानुकूलित कमरों तक

और न ही पहुँच पाती है

कविता ही

जो सुना सके पसीने का महाकाव्‍य

जिसे हरिया लिखता है

चिलचिलाती दुपहर में

धरती के सीने पर

फ़सल की शक्‍ल में ।


[२]

खेत उदास हैं 


चिड़िया उदास है --

जंगल के खालीपन पर

बच्चे उदास हैं --

भव्य अट्टालिकाओं के

खिड़की-दरवाज़ों में कील की तरह

ठुकी चिड़िया की उदासी पर


खेत उदास हैं --

भरपूर फ़सल के बाद भी

सिर पर तसला रखे हरिया

चढ़-उतर रहा है एक-एक सीढ़ी

ऊँची उठती दीवार पर


लड़की उदास है --

कब तक छिपाकर रखेगी जन्मतिथि


किराये के हाथ

लिख रहे हैं दीवारों पर

'उदास होना

भारतीयता के खिलाफ़ है !'


[३]

रौशनी के उस पार

खुली चौड़ी सड़क से दूर

शहर के किनारे

गन्दे नाले के पास

जहाँ हवा बोझिल है

और मकान छोटे हैं

परस्पर सटे हुए

पतली वक्र-रेखाओं-सी गलियाँ

जहाँ खो जाती हैं चुपचाप

बन जाती हैं

सपनों की क़ब्रगाह

भूख की अँधेरी गुफ़ाएँ

नंग-धड़ंग घूमते बच्चों की आँखों में


अँधेरे-उजाले के बीच

गुप्त सन्धि के बाद

गली के खम्भों पर रौशनी नहीं उगती

पानी नहीं आता नल में

सूँ-सूँ की आवाज़ के बाद भी

रह जाती है सीमित

अख़बार की सुर्ख़ियों तक

विश्व बैंक की धनराशि

 

रौशनी के उस पार

जहाँ आदमी मात्र एक यूनिट है

राशन कार्ड पर चढ़ा हुआ

या फिर काग़ज़ का एक टुकड़ा

जिसे मतपेटी में डालते ही

हो जाता है वह अपाहिज़

और दुबक रहने के लिए अभिशप्त भी


रौशनी के उस पार

जहाँ सूरज डूबता है हर रोज़

लेकिन कभी उगता नहीं है

भूले-भटके भी

जहाँ रात की स्याही

दबोच लेती है कालिख बनकर

परस्पर सटे और अँधेरे में डूबे

मकानों को!