साहित्य कै नजरिया से भारत एक समृद्ध देश हौ. भारत में साहित्य कै समृद्धता कै प्रमुख कारण हौ भारत कै तमाम संस्कृति अउर भाषा. तमाम भाषा अउर संस्कृति से भारत के साहित्य सँवारल गइल हौ . भारतीय भाषन मा भोजपुरी भाषा कै आपन एक अलग पहिचान बा. भोजपुरी भाषा कै मिठास आऊर आपनपन अनायासे केहू के अपनी ओर खींच लेवेले. भोजपुरी भाषा के साहित्य बहुते पुरान समृद्ध रहल हौ. भोजपुरी भाषा में तमाम बड़का साहित्यकार भइलन. जे लोग अपने रचनन से भोजपुरी साहित्य के परवान चढ़ौलन.आदिकाल :- भोजपुरी साहित्य कै शुरुआत सातवीं शताब्दी से मानल गइल बा. कहल जाता की हर्ष वर्धन के समइया में ईशानचन्द्र आऊर बेनीभारत ई दुइ जन कवि लोग संस्कृति भाषा के अलावा गाँव के बोली भाषा में साहित्य के रचना कइलन. जेकरे बाद से भोजपुरी साहित्य के शुरुआत भइल हौ. नाथ संप्रदाय के गुरु गोरखनाथ के लेखनी में भोजपुरी शब्दन कै प्रयोग देखे के मिलल. 

मध्य काल:- भोजपुरी साहित्य मध्यकाल में पूरा विख्यात अउर विकसित नाही हो सकल रहे. लेकिन ओ समय के भक्ति शाखा के हिंदी कवियन के रचना में भोजपुरी भाषा के प्रयोग देखल जाता. भाषाविद ग्रियर्सन के हिसाब से विद्यापति आपन तमाम रचना भोजपुरी भाषा में कइलन. 

आधुनिक काल:- आधुनिक काल के शुरूआती समय के ही भोजपुरी साहित्य के नवजागरण काल मानल जाता ई समय के कवियन में तेग अली, हीरा डोम, बुलाकी दास, दूधनाथ उपाध्याय रघुवीर नारायण, महेंद्र मिसिर अउर भिखारी ठाकुर जैसे लोगन के नाम प्रमुखता से लिहल जाता.  

भोजपुरी भाषा के कुछ श्रेष्ठ साहित्यकार आऊर उनकर रचना - 


(१) भिखारी ठाकुर (18 दिसंबर, 1887 - 10 जुलाई, सन 1971) भोजपुरी भाषा के गीतकार, नाटककार आ लोक कलाकार रहलें. इनका के भोजपुरी क शेक्सपीयर भी कहल जाला. भिखारी के ओह समय के समाज में ब्याप्त कुरीति सभ के ऊपर अपना ब्यंग करे आ बदलाव के जरूरत महसूस करावे खातिर जानल जालन. पढ़ल जाव उनकर रचना

[१]


[१] आवेला आसाढ़ मास, लागेला अधिक आस,

बरखा में पिया रहितन पासवा बटोहिया।


पिया अइतन बुनिया में,राखि लिहतन दुनिया में,

अखरेला अधिका सवनवाँ बटोहिया।


आई जब मास भादों, सभे खेली दही-कादो,

कृस्न के जनम बीती असहीं बटोहिया।


आसिन महीनवाँ के, कड़ा घाम दिनवाँ के,

लूकवा समानवाँ बुझाला हो बटोहिया।


कातिक के मासवा में, पियऊ का फाँसवा में,

हाड़ में से रसवा चुअत बा बटोहिया।


अगहन- पूस मासे, दुख कहीं केकरा से?

बनवाँ सरिस बा भवनवाँ बटोहिया।


मास आई बाघवा, कँपावे लागी माघवा,

त हाड़वा में जाड़वा समाई हो बटोहिया।


पलंग बा सूनवाँ, का कइली अयगुनवाँ से,

भारी ह महिनवाँ फगुनवाँ बटोहिया।


अबीर के घोरि-घोरि, सब लोग खेली होरी,

रँगवा में भँगवा परल हो बटोहिया।


कोइलि के मीठी बोली, लागेला करेजे गोली,

पिया बिनु भावे ना चइतवा बटोहिया।


चढ़ी बइसाख जब, लगन पहुँची तब,

जेठवा दबाई हमें हेठवा बटोहिया।


मंगल करी कलोल, घरे-घरे बाजी ढोल,

कहत ‘भिखारी’ खोजऽ पिया के बटोहिया।


(२) हीरा डोम (जन्म- 1885 ई॰) पहिला दलित कवि के रूप में जानल जातडन. जिनकर एकहि गो भोजपुरी कविता साहित्यिक पत्रिका सरस्वती में छपल रहे. जे में ऊ समय के सामाजिक, धार्मिक अउर आर्थिक विसंगति मार्मिक रूप से दर्शावल गइल रहल. पढ़ल जाव उनकर रचना


[१] अछूत की शिकायत

हमनी के राति दिन दुखवा भोगत बानी

हमनी के साहेब से मिनती सुनाइबि।

हमनी के दुख भगवानओं न देखता ते,

हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि।

पदरी सहेब के कचहरी में जाइबिजां,

बेधरम होके रंगरेज बानि जाइबिजां,

हाय राम! धसरम न छोड़त बनत बा जे,

बे-धरम होके कैसे मुंहवा दिखइबि॥१॥


खंभवा के फारी पहलाद के बंचवले।

ग्राह के मुँह से गजराज के बचवले।

धोती जुरजोधना कै भइया छोरत रहै,

परगट होके तहां कपड़ा बढ़वले।

मरले रवनवाँ कै पलले भभिखना के,

कानी उँगुरी पै धैके पथरा उठले।

कहंवा सुतल बाटे सुनत न बाटे अब।

डोम तानि हमनी क छुए से डेराले॥२॥


हमनी के राति दिन मेहत करीजां,

दुइगो रूपयावा दरमहा में पाइबि।

ठाकुरे के सुखसेत घर में सुलत बानीं,

हमनी के जोति-जोति खेतिया कमाइबि।

हकिमे के लसकरि उतरल बानीं।

जेत उहओं बेगारीया में पकरल जाइबि।

मुँह बान्हि ऐसन नौकरिया करत बानीं,

ई कुल खबरी सरकार के सुनाइबि॥३॥


बभने के लेखे हम भिखिया न मांगबजां,

ठकुर क लेखे नहिं लउरि चलाइबि।

सहुआ के लेखे नहि डांड़ी हम जोरबजां,

अहिरा के लेखे न कबित्त हम जोरजां,

पबड़ी न बनि के कचहरी में जाइबि॥४॥


अपने पहसनवा कै पइसा कमादबजां,

घर भर मिलि जुलि बांटि-चोंटि खदबि।

हड़वा मसुदया कै देहियां बभनओं कै बानीं,

ओकरा कै घरे पुजवा होखत बाजे,

ओकरै इलकवा भदलैं जिजमानी।

सगरै इलकवा भइलैं जिजमानी।

हमनी क इनरा के निगिचे न जाइलेजां,

पांके से पिटि-पिटि हाथ गोड़ तुरि दैलैं,

हमने के एतनी काही के हलकानी॥५॥


(३) तेग अली तेग एगो भोजपुरी लेखक अउर कवि रहलन. ई बनारस के रहलन अउर आपन किताब बदमास दरपन के लाने प्रखयात बाड़न. इनकरा के भोजपुरी मे पहिलका हाली गजल लिखे के श्रेय दिहल जाला. इनकरा सभ से प्रख्यात किताब बदमास दरपन बा जेवन की एगो गजल संग्रह बाटे. पढ़ल जाव उनकर रचना

[१] 


[१] सुरमा आँखी में नाहीं ई तू छुलावत बाटऽ।

बाढ दूतर्फी बिछूआ पै चढ़ावत बाटऽ।।

अत्तर देही में नाहीं तू ई लगावत बाटऽ।।

जहर के पानी में तेरुआर बुझावत बाटऽ।।

कहलीं के काहें आँखी में सुरमा लगावेलऽ ?

हँस के कहलैं छुरी के पत्थर चटाइला।।

पुतरी मतिन रक्खब तुहें पलकन के आड़ में।

तोहरे बदे हम आँखी में बैठक बनाइला।।


(४) दिनेश भ्रमर (26 जून 1939) प्रख्यात हिंदी और भोजपुरी कवि बाड़न. उनका के भोजपुरी साहित्य में ग़ज़ल अउर रुबाई के शुरुआत करेके श्रेय दिहल जाता. पढ़ल जाव उनकर रच[१]

आँख में आके बस गइल केहू

प्रान हमरो परस गइल केहू


हमरे लीपल-पोतल अँगनवाँ में

बन के बदरा बरस गइल केहू


गोर चनवा पे ई सॉवर अँधेरा

देखि के बा तरस गइल केहू


फूल त काँट से ना कहलस कुछ

झूठे ओकरा पे हँस गइल केहू


कंठ के जब बजल पिपिहरी तब

बीन के तार कस गइल केहू


(५) मनोज भावुक ( 2 January 1976 ) भोजपुरी भाषा के कवि अउर अभिनेता बाड़न. २००६ उनकर ग़ज़ल संग्रह "तस्वीर ज़िन्दगी की" के खातिर उनका के भारतीय भाषा परिषद पुरस्कार से सम्मानित कइल गइल बा. पढ़ल जाव उनकर रच[१]

बचपन के हमरा याद के दरपन कहाँ गइल

माई रे, अपना घर के ऊ आँगन कहाँ गइल

खुशबू भरल सनेह के उपवन कहाँ गइल

भउजी हो, तहरा गाँव के मधुवन कहाँ गइल

खुलके मिले-जुले के लकम अब त ना रहल

विश्वास, नेह, प्रेम-भरल मन कहाँ गइल

हर बात पर जे रोज कहे दोस्त हम हईं

हमके डुबाके आज ऊ आपन कहाँ गइल

बरिसत रहे जे आँख से हमरा बदे कबो

आखिर ऊ इन्तजार के सावन कहाँ गइल