[Kavishala Labs] सघन तिमिर में आलोक खोज लेना, निराशा में भी आशा जगाये रखना और असंभावना में भी संभावना ढूंढ लेना कुंवर नारायण की विशेषता रही है. कुंवर नारायण सामाजिक समस्याओं पर पैनी नजर रखते थे. उनकी कविताओं में दर्शन व मनोविज्ञान प्रदर्शित होता है. वे मानवीय संवेदनाओं की गहराई में उतर कर कविता लिखते थे.
कुँवर नारायण (19 सितम्बर 1927 — 15 नवम्बर 2017) हिंदी के कवि व लेखक थे. नई कविता आन्दोलन के सशक्त हस्ताक्षर कुँवर नारायण अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के प्रमुख कवियों में से एक थे .कुँवर नारायण को उनकी रचनाशीलता में इतिहास और मिथक के जरिये वर्तमान को देखने के लिए जाना जाता है. कुंवर नारायण का रचना संसार विस्तृत एवं जटिल है. हालाँकि कुंवर नारायण की मूल विधा कविता रही है लेकिन कविता अलावा उन्होंने कहानी, लेख व समीक्षाओं के साथ-साथ सिनेमा, रंगमंच एवं अन्य कलाओं पर भी श्रेष्ठ रचनाएं की है. विस्तृत रचना क्षेत्र होने के कारण जहाँ उनके लेखन में सहज संप्रेषणीयता आई वहीं वे प्रयोगधर्मी भी बने रहे.
इस दौर के सर्वश्रेष्ठ रचनाकारों में कुंवर नारायण का नाम अंकित है. अपनी कविताओं के जरिये उन्होंने हिन्दी कविता पाठकों को एक नई समझ दी. उन्होंने संग्रह 'परिवेश हम तुम' के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं व संबंधों की एक अनोखी व्याख्या हम सबके समक्ष रखी. साथ ही उन्होंने अपने प्रबंध 'आत्मजयी' में मृत्यु संबंधी शाश्वत समस्या को कठोपनिषद का माध्यम बनाकर अद्भुत व्याख्या के साथ हमारे सामने रखा.
काव्य संग्रह 'वाजश्रवा के बहाने', में कुंवर नारायण ने 'अमूर्त'को एक अत्यधिक सूक्ष्म संवेदनात्मक शब्दावली देकर नई उत्साह परख जिजीविषा को वाणी दी है. जहाँ एक ओर आत्मजयी में कुँवरनारायण जी ने मृत्यु जैसे विषय का निर्वचन किया है, वहीं इसके ठीक विपरीत 'वाजश्रवा के बहाने' कृति में अपनी विधायक संवेदना के साथ जीवन के आलोक को रेखांकित किया है. यह रचना आज के इस बर्बर समय में भटकती हुई मानसिकता को न केवल राहत देती है, बल्कि यह प्रेरणा भी देती है कि दो पीढ़ियों के बीच समन्वय बनाए रखने का समझदार ढंग क्या हो सकता है.
कुंवर नारायण की कविताओं-कहानियों का कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है.‘तनाव‘ पत्रिका के लिए उन्होंने कवाफी तथा ब्रोर्खेस की कविताओं का भी अनुवाद किया है. 2009 में उन्हें वर्ष 2005 के लिए भारत के साहित्य जगत के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. प्रस्तुत है उनकी कुछ कविताएं-
[१]
आंकड़ों की बीमारी
एक बार मुझे आंकड़ों की उल्टियां होने लगीं
गिनते गिनते जब संख्या
करोड़ों को पार करने लगी
मैं बेहोश हो गया
होश आया तो मैं अस्पताल में था
खून चढ़ाया जा रहा था
आक्सीजन दी जा रही थी
कि मैं चिल्लाया
डाक्टर मुझे बुरी तरह हंसी आ रही
यह हंसानेवाली गैस है शायद
प्राण बचानेवाली नहीं
तुम मुझे हंसने पर मजबूर नहीं कर सकते
इस देश में हर एक को अफसोस के साथ जीने का
पैदाइशी हक है वरना
कोई माने नहीं रखते हमारी आजादी और प्रजातंत्र
बोलिए नहीं – नर्स ने कहा – बेहद कमजोर हैं आप
बड़ी मुश्किल से काबू में आया है रक्तचाप
डाक्टर ने समझाया – आंकड़ों का वाइरस
बुरी तरह फैल रहा आजकल
सीधे दिमाग पर असर करता
भाग्यवान हैं आप कि बच गए
कुछ भी हो सकता था आपको –
सन्निपात कि आप बोलते ही चले जाते
या पक्षाघात कि हमेशा कि लिए बंद हो जाता
आपका बोलना
मस्तिष्क की कोई भी नस फट सकती थी
इतनी बड़ी संख्या के दबाव से
हम सब एक नाजुक दौर से गुजर रहे
तादाद के मामले में उत्तेजना घातक हो सकती है
आँकड़ों पर कई दवा काम नहीं करती
शांति से काम लें
अगर बच गए आप तो करोड़ों में एक होंगे…
अचानक मुझे लगा
खतरों से सावधान कराते किसी संकेत-चिह्न में
बदल गई थी डाक्टर की सूरत
और मैं आंकड़ों का काटा
चीखता चला जा रहा था
कि हम आँकड़े नहीं आदमी हैं
[२]
एक बार ख़बर उड़ी
कि कविता अब कविता नहीं रही
और यूँ फैली
कि कविता अब नहीं रही !
यक़ीन करनेवालों ने यक़ीन कर लिया
कि कविता मर गई,
लेकिन शक़ करने वालों ने शक़ किया
कि ऐसा हो ही नहीं सकता
और इस तरह बच गई कविता की जान
ऐसा पहली बार नहीं हुआ
कि यक़ीनों की जल्दबाज़ी से
महज़ एक शक़ ने बचा लिया हो
किसी बेगुनाह को ।
[३]
एक भाषा जब सूखती
शब्द खोने लगते अपना कवित्व
भावों की ताज़गी
विचारों की सत्यता –
बढ़ने लगते लोगों के बीच
अपरिचय के उजाड़ और खाइयाँ ......
सोच में हूँ कि सोच के प्रकरण में
किस तरह कुछ कहा जाय
कि सब का ध्यान उनकी ओर हो
जिनका ध्यान सब की ओर है –
कि भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में
आग यदि लगी तो पहले वहाँ लगेगी
जहाँ ठूँठ हो चुकी होंगी
अपनी ज़मीन से रस खींच सकनेवाली शक्तियाँ ।
[४]
फ़ोन की घण्टी बजी
मैंने कहा - मैं नहीं हूं
और करवट बदल कर सो गया।
दरवाज़े की घण्टी बजी
मैंने कहा - मैं नहीं हूं
और करवट बदल कर सो गया।
अलार्म की घण्टी बजी
मैंने कहा - मैं नहीं हूं
और करवट बदल कर सो गया।
एक दिन
मौत की घण्टी बजी...
हड़बड़ा कर उठ बैठा -
मैं हूँ... मैं हूँ... मैं हूँ..
मौत ने कहा -
करवट बदल कर सो जाओ।
[५]
एक हरा जंगल धमनियों में जलता है।
तुम्हारे आँचल में आग...
चाहता हूँ झपटकर अलग कर दूँ तुम्हें
उन तमाम संदर्भों से जिनमें तुम बेचैन हो
और राख हो जाने से पहले ही
उस सारे दृश्य को बचाकर
किसी दूसरी दुनिया के अपने आविष्कार में शामिल
कर लूँ
लपटें
एक नए तट की शीतल सदाशयता को छूकर
लौट जाएँ।

