[Kavishala Labs] साहित्य समय के साथ बदलता व समृद्ध होता रहता है. पीढ़ी दर पीढ़ी साहित्य का रूप समय परिस्थिति के अनुसार परिवर्तित होता रहता है. इस परिवर्तन में युवाओ का विशेष योगदान होता है. आइये मिलते है हिंदी के युवा कवियों से और पढ़ते हैं उनकी कविताएं
(1) आईएएस डॉ. हरिओम का जन्म अमेठी (उ.प्र.) के गांव कटारी में हुआ है. डॉ. हरिओम एक लोकप्रिय कवि व लेखक भी हैं. उनकी लोकप्रियता उनकी कविताओं की वजह से भी है. पढ़िए उनकी रचना के कुछ अंश-
आज शाख़ों पे परिंदे चुप हैं
आज मौसम उदास लगता है
दूर रहकर भी पास लगता है
तू मेरे साथ साथ लगता है
वो मुझको देखके संजीदा समझता होगा
मैं कैसे इल्तिजा-ए-इश्क़ की नादानी करूँ
बड़ी अजीब है दश्त-ओ-चमन की ख़ामोशी
मैं कैसे बोलते पेड़ों की बाग़बानी करूँ
(2) जितेन्द्र कुमार सोनी का जन्म जन्म: 29 नवम्बर 1981 में रजथान के धन्नासर , हनुमानगढ़ हुआ था. जीतेन्द्र सोनी एक आईएएस अधिकारी व राजस्थानी साहित्य के लोकप्रिय कवि हैं. पढ़िए उनकी दो कविताएं -
हौसला
कुचले, मसले, पराजित तो
बहुतेरे विकल्प हैं आपके पास
निराशा, भड़ास, लांछन, निंदा
या फिर से हौसला
मुश्किल है सबसे ज्यादा
दुबारा खड़ा होना हौसले से
बनिस्पत उन सब विकल्पों के
जहां तक आप सोच सकते हैं
पर नामुमकिन नहीं है
हौसला
खैरात, भाग्य, तुक्का, भौतिक नहीं
बल्कि आस, विश्वास, प्रयास है
राख होने पर भी उड़ पाने का
चट्टान से भी एक बीज के प्रस्फुटन का
किरचे-किरचे समेटकर वजूद पाने का
हौसला
ना तो किसी की बपौती है
ना ही काठ की हांडी !
(3) निशांत जैन एक आईएएस अधिकारी व लोकप्रिय कवि है. उनकी शोधपरक किताब ‘राजभाषा के रूप में हिंदी’ नेशनल बुक ट्रस्ट, भारत सरकार से और बाल कविता संकलन ‘शादी बंदर मामा की’ प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित हुई है. पढ़िए उनकी कविता,
भावों की तू अजब पिटारी, अरमानों का तू सागर,
नाज़ुक से अहसासों की एक, नर्म-मुलायम सी चादर।
खट्टी-मीठी फटकारें और कभी पलटकर वही दुलार,
जीवन का हर पल तुझमें माँ, तुझसे है सारा संसार।
जिसकी खातिर सब कुछ वारा, अपनी खुशियाँ जानी ना,
वक़्त कहाँ उस पर अब माँ, तेरे दुःख-दर्द चुराने का।
उम्मीदों को पंख लगाने, बड़े शहर को निकला जब,
छुपी रुलाई देखी तेरी, प्यार का तब समझा मतलब।
मिट्टी की तू सोंधी खुशबू, सम्बन्धों की नर्म नमी,
नए शहर में हर मुकाम पर, बस तेरी ही खली कमी।
हैरत है हर चेहरे पर थे, कई मुखौटे और नकाब,
तुझसा भी क्या कोई होगा, चलती -फिरती खुली किताब।
रिश्तों की गर्माहट तुझसे, तुझसे प्यार भरा अहसास,
ले भरपूर दुआयें अपनी, हरदम थी तू मेरे पास।
किसने कहा फरिश्तों के जग में दीदार नहीं होते,
माँ की गोद में एक झपकी, सपने साकार सभी होते।
(4)अनुज लुगुन का जन्म 10 जनवरी 1986 को झारखंड के सिमडेगा जिले में हुआ था. उनकी रचनाएँ आदिवासी जीवन पर आधारित हैं, जो कि आदिवासी विमर्श के लिए उल्लेखनीय विषय है. वर्तमान में ये दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी शिक्षक हैं. पढ़िए उनकी दो कवितायेँ -
अख़बार
मेरे कमरे में पुराना अख़बार
हवा के झोंके से फड़फड़ा रहा है
शायद वह कह रहा है
कि उसे पहुँचा दिया जाए
विज्ञापन कम्पनियों के यहाँ
जिन्होंने उसके चेहरे पर
झूठ का रंगपोत दिया है
या, वह कह रहा है
कि उसे पहुँचा दिया जाए
उन विद्रोहियों के यहाँ जंगल में
जिनसे मुठभेड़ की ख़बर छपी है
मैं चुपके से उठता हूँ
और धीरे से अख़बार को
काठ की तख़्ती से दबा देता हूँ ।
(5)गौरव सोलंकी का जन्म ७ जुलाई १९८६ को मेरठ (उत्तर प्रदेश) में हुआ. वे एक लोकप्रिय हिंदी कवि है. सोशल मीडिया में और युवाओं के बीच उनकी विशेष लोकप्रियता है. पढ़िए उनकी कविता.
मैं उसके जिस्म में गुंथा हुआ था
तब भी उसने कहा कि वो मुझे अच्छी तरह नहीं जानती
यह पुलिस की एफ़ आई आर में लिखा है
और आप कभी भी उधर से गुज़रें तो चैक कर सकते हैं
उसके बाद कई दिन तक मैंने सोचा कि किसी पतंग के साथ कट जाऊं
और मेरी याद में कोई सभा भी न हो
लेकिन यह बहुत हताशा भरी बात थी
इसलिए मैंने जताया कि मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता
हमारे कई दोस्त साझे थे
और ज़िन्दा रहने के लिए ज़रूरी था
कि मैं उनकी हत्या कर दूं
पर यह भी मुमकिन नहीं हो सका जज़्बाती कारणों से
इसलिए मैंने ख़ुद को बेहतर इंसान की तरह पेश किया
और ख़ुद को एक खिड़की के आकार में काटा
जैसे देखा जा सकता हो मेरे आर-पार
यह एक साज़िश थी
और इससे मुझे बहुत कुछ हासिल भी हुआ
सिवा अपने जिस्म के
जो कई हिस्सों में कटकर उसके पास पड़ा था
मैं रूह की बात नहीं करूंगा यहां
क्योंकि इतनी हैसियत नही
(6)मानव कौल (जन्म १९७६) एक भारतीय फ़िल्म अभिनेता ,कवि नाटककार, लेखक तथा मंच निर्देशक है। उनकी 5 किताबें भी प्रकाशित हो चुकी हैं जिसमे 2 कहानी संग्रह हैं, 1 ना कहानी ना कविता है, एक यात्रा व्रतांत है और एक अंग्रेजी रूपांतरण है इन्हीं की किताब ठीक तुम्हारे पीछे का। पढ़िए उनकी कविता
दरवाज़े
सबके सामने नंगा होने का डर इतना बड़ा है
कि मैं घर हो गया हूँ—
दो खिड़की और एक छोटे-से दरवाज़े वाला
जहाँ से मुझे भी घिसट कर निकलना पड़ता है।
किसी के आने की गुंजाइश उतनी ही है
जितनी मेरे किसी के पास जाने की।
सबके अपने-अपने घर हैं
अपने-अपने डर हैं
इसलिए अपने-अपने दरवाज़
(7)नीलोत्पल मृणाल का जन्म २३ जून, १९७५ रतलाम, (मध्य प्रदेश) में हुआ. वे एक प्रसिद्ध हिंदी कवि हैं. विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ प्रकाशित हुई हैं. पढ़िए उनकी कविता,-
उस पुराने जर्जर मकान की तरह
जहाँ अब कोई नहीं रहता
वहाँ प्यार, उत्सव, सँघर्ष दफ़न है
जो किसी के नहीं
सिवाए उस राख के
जो चुन ली गई नदी के बहाव में
काटती लहर को
मैं आता हूँ वह स्मृति लिए
तुम्हारे पास
मैं चाहता हूँ कि
जो सुन्दर और अनाम चीज़ें दफ़न हैं
उन्हें हम देखें
हमारे बीच जाने कितने समुन्दर हैं
जाने कितनी फैली वृक्षों की जड़ें
लेकिन कितना बिखराव !
मैं तुम्हें उसी तरह चूमना चाहता हूँ
कि वह नष्ट संसार
हमें अपनी अधूरी आँखों से देखे
और दे सके हमें वे निर्जीव शब्द
जिसके लिए एक आदमी जीता है
अपनी मृत्यु के बाद भी
होगा यह कि
हम मरेंगे अपनी-अपनी यादों के साथ
ख़ाली आकाश से देखते हुए
नीचे वह घर अभी
ज़िन्दा है उखड़ती साँसों में
प्यार अमर नहीं होगा
कुछ है जो बुदबुदाया जाएगा
सम्बलों की गहराई में
मैं तुम्हारी उँगलियों और आँखों के सहारे
महसूस करता रहूँगा
अपने जीवन के वे तमाम क्षण
जिन्हें हमने ताप और प्यार से रचा
जो किसी तरह घर होंगे
उखड़ते पोपडे़, सीलन और दरारों के बीच
धीमे-धीमे साँस लेते।
(8)ज़ाकिर खान का जन्म इंदौर, मध्य प्रदेश में हुआ था. ज़ाकिर स्टैंड-अप कॉमेडियन, कवि लेखक व अभिनेता हैं. 2012 में, उन्होंने कॉमेडी सेंट्रल की भारत की तीसरी सर्वश्रेष्ठ स्टैंड अप कॉमेडियन प्रतियोगिता जीतकर लोकप्रियता हासिल की. शुरूआती दौर में ज़ाकिर खान की कविता "मै शून्य में सवार हूँ" सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हुई थी. प्रस्तुत है उनकी कविता-
मैं शून्य पे सवार हूँ…
मैं शून्य पे सवार हूँ
बेअदब सा मैं खुमार हूँ
अब मुश्किलों से क्या डरूं
मैं खुद कहर हज़ार हूँ
मैं शून्य पे सवार हूँ
मैं शून्य पे सवार हूँ
उंच-नीच से परे
मजाल आँख में भरे
मैं लड़ रहा हूँ रात से
मशाल हाथ में लिए
न सूर्य मेरे साथ है
तो क्या नयी ये बात है
वो शाम होता ढल गया
वो रात से था डर गया
मैं जुगनुओं का यार हूँ
मैं शून्य पे सवार हूँ
मैं शून्य पे सवार हूँ
भावनाएं मर चुकीं
संवेदनाएं खत्म हैं
अब दर्द से क्या डरूं
ज़िन्दगी ही ज़ख्म है
मैं बीच रह की मात हूँ
बेजान-स्याह रात हूँ
मैं काली का श्रृंगार हूँ
मैं शून्य पे सवार हूँ
मैं शून्य पे सवार हूँ
हूँ राम का सा तेज मैं
लंकापति सा ज्ञान हूँ
किस की करूं आराधना
सब से जो मैं महान हूँ
ब्रह्माण्ड का मैं सार हूँ
मैं जल-प्रवाह निहार मैं शून्य पे सवार मैं शून्य पे सवार
(9)वरुण ग्रोवर :- एक कवि हास्य अभिनेता, पटकथा लेखक और गीतकार है. इनका जन्म जन्म 26 जनवरी, 1980 सुंदरनगर, हिमाचल प्रदेश में हुआ था. उनकी माँ एक स्कूल टीचर थी और पिता आर्मी इंजिनियर.उन्होंने अपना शुरुआती जीवन सुंदरनगर और देहरादून,उत्तराखंड में बिताया. उन्होंने 63 वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (भारत) 2015-16 में सर्व-श्रेष्ठ गीतकार का पुरस्कार जीता है.
चुप
चुप चुप चुप चुप
चुप चुप चुप चुप
नस नस में
रग रग में चुप चुप
आवाज़ों पर विष की वर्षा
काल करेगा वरना गुपचुप
चुप चुप चुप चुप
चुप चुप चुप चुप
नख में कख में
नाभि में चुप
ताले कुंडी
चाभी में चुप
चुप हुंकार भी
चुप मिमियाना
चोटें चुप और
चुप सहलाना
चुप ही सागर
चुप ही दलदल
चुप बुलडोज़र
बस्ती समतल
चुप ही आधी रात गली की
चुप सुनसान सा कोना
चुप ही सहमा बचता मानव
चुप चक्कू इक पैना
चुप ही मूक खड़ा वो दर्शक
चुप शर्मिंदा आँखें
चुप मंज़िल की चुप खिड़की से
जो चुपके से झाँकें
चुप ही आतम चुप परमातम
चुप ही हंस अकेला
चुप के मोहरे दोनों बाज़ू
चुप ही हारे खेला

