[Kavishala Labs] हिंदी साहित्य में अनेक प्रतिभा संपन्न साहित्यकार हुए हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं से समाज को दिशा दी व मानव मन की जिज्ञासाओं को शांत किया. हिंदी काव्य साहित्य के उत्कृष्ट कवियों की कविताएं कभी विरह में बेकल प्रेमी युगल का सम्बल बनी तो, कभी देश के लोगों को देश प्रेम व मातृभूमि के प्रति उनके दायित्व का ज्ञान कराया. गोपाल सिंह नेपाली एक ऐसे ही कवि थे जिन्होंने अपनी रचनाओं से प्रेम, विरह, राष्ट्र प्रेम, मानव मन के जिज्ञासाओं को शांत करने का सफल प्रयास किया.


गोपाल सिंह नेपाली ( 11 अगस्त 1911 - 17 April 1963 ) हिन्दी एवं नेपाली के प्रसिद्ध कवि थे. उन्होने हिन्दी फिल्मों के लिये गाने भी लिखे. वे एक पत्रकार भी थे उन्होंने "रतलाम टाइम्स", चित्रपट, सुधा, एवं योगी नामक चार पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया. सन् 1962 के चीनी आक्रमण के समय उन्होने कई देशभक्तिपूर्ण गीत एवं कविताएं लिखीं जिनमें 'सावन', 'कल्पना', 'नीलिमा', 'नवीन कल्पना करो' आदि बहुत प्रसिद्ध हैं.


मुंशी प्रेम चंद, निराला व जय शंकर प्रसाद जैसे साहित्यकार भी करते थे प्रसंसा : गोपाल सिंह नेपाली कि काव्य प्रतिभा अद्वितीय थी. उनकी कविताओं को पढ़ने और सुनने वाले सम्मोहित हो जाते थें. साधारण पाठको और श्रोताओं के अलावा तत्कालीन श्रेष्ठ साहित्यकार भी गोपाल सिंह नेपाली की काव्य प्रतिभा के कायल थे. कहा जाता है कि - कवि जयशंकर प्रसाद स्नान करते समय अक्सर नेपालीजी की ये पंक्तियां गुनगुनाया करते थे - 'पीपल के पत्ते गोल-गोल. कुछ कहते रहते डोल-डोल' .

पहली बार गोपाल सिंह नेपाली की कविता सुनने के बाद मुंशी प्रेमचंद ने कहा था- 'बरखुर्दार क्या पेट से ही कविता सीखकर पैदा हुए हो?' 


जानकी वल्लभ शास्त्री ने कहा था- ‘मिल्टन, कीट्स और शेली जैसे त्रय कवियों की प्रतिभा नेपाली में त्रिवेणी संगम की तरह उपस्थित है।’ सुप्रसिद्ध कवि सुमित्रा नंदन पंत ने गोपाल सिंह नेपाली कि कविताओं पर कहा था- ‘आपकी सरस्वती, स्नेह, सह्रदयता और सौंदर्य की सजीव प्रतिमा है’. कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी ने गोपाल सिंह नेपाली की कविताओं को पढ़कर उन्हें ‘काव्याकाश का दैदीप्यमान’ सितारा कहा था. 


गोपाल सिंह नेपाली उत्तर छायावाद उन कवियों में से एक हैं जिन्होंने कविता को जनप्रिय बनाया. श्रृंगार व प्रणव गीतों से श्रोताओं व पाठकों का मन मोह लेने वाले 'नेपाली' की कलम ने राष्ट्र-प्रेम के गीतों से युवाओं में देशभक्ति के भावों का भरपूर संचार किया.  

हिंदी साहित्य में गोपाल सिंह नेपाली के द्वारा दिया गया योगदान अविस्मरणीय है. पढ़िए उनकी कुछ कविताएं 


[१]

घोर अंधकार हो,

चल रही बयार हो,

आज द्वार-द्वार पर यह दिया बुझे नहीं

यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है। 

शक्ति का दिया हुआ,

शक्ति को दिया हुआ,

भक्ति से दिया हुआ,

यह स्वतंत्रता-दिया,

रुक रही न नाव हो

ज़ोर का बहाव हो,

आज गंग-धार पर यह दिया बुझे नहीं,

यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है।


[२]

बदनाम रहे बटमार मगर, घर तो रखवालों ने लूटा

मेरी दुल्हन सी रातों को, नौलाख सितारों ने लूटा


दो दिन के रैन-बसेरे में, हर चीज़ चुराई जाती है

दीपक तो जलता रहता है, पर रात पराई होती है

गलियों से नैन चुरा लाई, तस्वीर किसी के मुखड़े की

रह गये खुले भर रात नयन, दिल तो दिलदारों ने लूटा


जुगनू से तारे बड़े लगे, तारों से सुंदर चाँद लगा

धरती पर जो देखा प्यारे, चल रहे चाँद हर नज़र बचा

उड़ रही हवा के साथ नज़र, दर-से-दर, खिड़की से खिड़की

प्यारे मन को रंग बदल-बदल, रंगीन इशारों ने लूटा


हर शाम गगन में चिपका दी, तारों के अधरों की पाती

किसने लिख दी, किसको लिख दी, देखी तो, कही नहीं जाती

कहते तो हैं ये किस्मत है, धरती पर रहने वालों की

पर मेरी किस्मत को तो, इन ठंडे अंगारों ने लूटा


जग में दो ही जने मिले, इनमें रूपयों का नाता है

जाती है किस्मत बैठ जहाँ, खोटा सिक्का चल जाता है

संगीत छिड़ा है सिक्कों का, फिर मीठी नींद नसीब कहाँ

नींदें तो लूटीं रूपयों ने, सपना झंकारों ने लूटा


वन में रोने वाला पक्षी, घर लौट शाम को आता है

जग से जानेवाला पक्षी, घर लौट नहीं पर पाता है

ससुराल चली जब डोली तो, बारात दुआरे तक आई

नैहर को लौटी डोली तो, बेदर्द कहारों ने लूटा


[३]


अपनेपन का मतवाला था भीड़ों में भी मैं

खो न सका

चाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्ता

मैं हो न सका


देखा जग ने टोपी बदली

तो मन बदला, महिमा बदली

पर ध्वजा बदलने से न यहाँ

मन-मंदिर की प्रतिमा बदली


मेरे नयनों का श्याम रंग जीवन भर कोई

धो न सका

चाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्ता

मैं हो न सका


हड़ताल, जुलूस, सभा, भाषण

चल दिए तमाशे बन-बनके

पलकों की शीतल छाया में

मैं पुनः चला मन का बन के


जो चाहा करता चला सदा प्रस्तावों को मैं

ढो न सका

चाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्ता

मैं हो न सका


दीवारों के प्रस्तावक थे

पर दीवारों से घिरते थे

व्यापारी की ज़ंजीरों से

आज़ाद बने वे फिरते थे


ऐसों से घिरा जनम भर मैं सुखशय्या पर भी

सो न सका

चाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्ता

मैं हो न सका


[४]

ओ मृगनैनी, ओ पिक बैनी,

तेरे सामने बाँसुरिया झूठी है!

रग-रग में इतना रंग भरा,

कि रंगीन चुनरिया झूठी है!


मुख भी तेरा इतना गोरा,

बिना चाँद का है पूनम!

है दरस-परस इतना शीतल,

शरीर नहीं है शबनम!

अलकें-पलकें इतनी काली,

घनश्याम बदरिया झूठी है!


रग-रग में इतना रंग भरा,

कि रंगीन चुनरिया झूठी ह !

क्या होड़ करें चन्दा तेरी,

काली सूरत धब्बे वाली!

कहने को जग को भला-बुरा,

तू हँसती और लजाती!

मौसम सच्चा तू सच्ची है,

यह सकल बदरिया झूठी है!


रग-रग में इतना रंग भरा,

कि रंगीन चुनरिया झूठी है!


[५]

दूर जाकर न कोई बिसारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे,

यूँ बिछड़ कर न रतियाँ गुजारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे ।


मन मिला तो जवानी रसम तोड़ दे, प्यार निभता न हो तो डगर छोड़ दे,

दर्द देकर न कोई बिसारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे ।


खिल रहीं कलियाँ आप भी आइए, बोलिए या न बोले चले जाइए,

मुस्कुराकर न कोई किनारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे ।


चाँद-सा हुस्न है तो गगन में बसे, फूल-सा रंग है तो चमन में हँसे,

चैन चोरी न कोई हमारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे ।


हमें तकें न किसी की नयन खिड़कियाँ, तीर-तेवर सहें न सुनें झिड़कियाँ,

कनखियों से न कोई निहारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे ।


लाख मुखड़े मिले और मेला लगा, रूप जिसका जँचा वो अकेला लगा,

रूप ऐसे न कोई सँवारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे ।


रूप चाहे पहन नौलखा हार ले, अंग भर में सजा रेशमी तार ले,

फूल से लट न कोई सँवारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे ।


पग महावर लगाकर नवेली रँगे, या कि मेहँदी रचाकर हथेली रँगे,

अंग भर में न मेहँदी उभारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे ।


आप पर्दा करें तो किए जाइए, साथ अपनी बहारें लिए जाइए,

रोज घूँघट न कोई उतारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे ।


एक दिन क्या मिले मन उड़ा ले गए, मुफ्त में उम्र भर की जलन दे गए,

बात हमसे न कोई दुबारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे