सामान्यतः किसी भी साहित्यकार की लोकप्रियता उसके साहित्य के भाषा और क्षेत्र पर निर्भर करती है. लेकिन कुछ ऐसे भी साहित्यकार है जिनकी रचनाओं ने क्षेत्र व भाषा की सीमा तोड़ कर देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में लोकप्रियता हासिल की. उनकी रचनाओं की सहजता, चरित्रों का चित्रण, कथा वस्तु व कथ्य इतने रुचिकर और आकर्षित करने वाले होते हैं कि किसी भी भाषा या क्षेत्र का पाठक उनकी रचना को पढता है तो उसे लगता है वह अपने जीवन की कहानी पढ़ रहा है. अपनी रचनाओं से भाषा व क्षेत्र की सीमा तोड़ने वाले ऐसे ही एक साहित्यकार थे शरत चंद्र चटर्जी. 


शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय (15 सितम्बर, 1876 - 16 जनवरी 1938) बांग्ला के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार एवं लघुकथाकार थे. वे बांग्ला के सबसे लोकप्रिय उपन्यासकार हैं. उनकी अधिकांश कृतियों में गाँव के लोगों की जीवनशैली, उनके संघर्ष एवं उनके द्वारा झेले गए संकटों का वर्णन है. इसके अलावा उनकी रचनाओं में तत्कालीन बंगाल के सामाजिक जीवन की झलक मिलती है. शरतचंद्र भारत के सार्वकालिक सर्वाधिक लोकप्रिय तथा सर्वाधिक अनूदित लेखक हैं. 


यूँ तो शरतचन्द्र बांग्ला भाषा के साहित्यकार थे लेकिन उनकी रचनाओं ने सम्पूर्ण भारत में उपन्यास पढ़ने व फिल्म देखने वालो की आँखे नम की. उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से तथाकथित सामाजिक 'आम सहमति' पर रचनात्मक हस्तक्षेप किया, यही कारण रहा की वे लाखों करोड़ों पाठकों के पसंदीदा साहित्यकार बने. नारी और अन्य शोषित समाजों के धूसर जीवन का उन्होंने चित्रण ही नहीं किया, बल्कि उनके आम जीवन में आच्छादित इन्दधनुषी रंगों की छटा भी बिखेरी. प्रेम को आध्यात्मिकता तक ले जाने में शरत का विशेष योगदान है.
युवा वर्ग के चहेते उपन्यासकार थे शरतचन्द्र : शरतचन्द्र की लेखनी ने युवा वर्ग को सम्मोहित किया. जहाँ एक ओर उनका सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास 'देवदास' युवको को इस कदर भाया कि वह इसे पढ़कर देवदास चरित्र में इतना डूबे कि कई ने तो देवदास बनने की कल्पना तक कर डाली. वहीँ चरित्रहीन' उपन्यास को पढ़कर युवतियां रो पड़ती थीं. 


"पथेर दाबी" को ब्रिटिश सरकार ने किया था बैन : शरतचन्द्र ने बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन पर “पथेर दावी” उपन्यास लिखा था. पहले यह “बंग वाणी” में धारावाहिक रूप से निकला, फिर पुस्तक के रूप में छपा तो तीन हजार का संस्करण तीन महीने में बिक गए. इसकी लोकप्रियता से डरकर ब्रिटिश सरकार ने इसे जब्त कर लिया. 


देवदास पर 12 भाषाओं में बनी फिल्में : शरतचन्द्र के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास "देवदास" पर 12 से अधिक भाषाओँ में फिल्मे बनी. हिंदी में देवदास को आधार बनाकर देवदास फ़िल्म का निर्माण तीन बार हो चुका है. पहली देवदास कुन्दन लाल सहगल द्वारा अभिनीत, दूसरी देवदास दिलीप कुमार, वैजयन्ती माला द्वारा अभिनीत तथा तीसरी देवदास शाहरुख़ ख़ान, माधुरी दीक्षित, ऐश्वर्या राय द्वारा अभिनीत. ये सभी फिल्मे सफल भी रही. "देवदास" के अलावा अन्य उपन्यासों पर आधारित हिन्दी फिल्में भी कई बार बनी हैं. उपन्यास चरित्रहीन पर आधारित 1974 में इसी नाम से फिल्म बनी थी.  


शरतचन्द्र के उपन्यासों का भी कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ है. शरतचन्द्र की लोकप्रियता उनकी कलात्मक रचना और नपे तुले शब्दों या जीवन से ओतप्रोत घटनावलियों के कारण नहीं है, बल्कि उनके उपन्यासों में नारी जिस प्रकार परंपरागत बंधनों से छटपटाती दिखी , उसकी वजह से है. शरतचन्द्र जिस प्रकार पुरुष और स्त्री के संबंधों को एक नए आधार पर स्थापित करने के लिए पक्ष प्रस्तुत किया गया है, उसी से उन्हें लोकप्रियता मिली. 


शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की रचनाएँ आज भी लोकप्रिय है. बांग्ला के अलावा हिन्दी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में आज भी उनकी रचनाएँ उत्सुकता से पढ़ी जाती हैं. अस्वस्थ रहने के कारण उनकी मृत्यु 16 जनवरी सन् 1938 ई. को हुई थी.