ईसा मसीह
औरत नहीं थे
वरना मासिक धर्म
ग्यारह बरस की उमर से
उनको ठिठकाए ही रखता
देवालय के बाहर!
वेथलेहम और यरूजलम के बीच
कठिन सफर में उनके
हो जाते कई तो बलात्कार...
[Kavishala Labs] स्त्री जीवन की चुनौतियों को दर्शाती ये पंक्तियाँ है कवयित्री अनामिका कि कविता "मरने की फुर्सत" की. अनामिका हिंदी की लोकप्रिय कवयित्रयी हैं. स्त्री-विमर्श व स्त्री जीवन की चुनौतियों पर बेबाकी से अपनी बात रखना अनामिका जी की विशेषता है. आधुनिक हिंदी कविता में अनामिका जी का विशिष्ट स्थान है.
अनामिका जी का जन्म 17 अगस्त 1961, मुजफ्फरपुर (बिहार) में हुआ. वे हिंदी की कवयित्री व आधुनिक समय में हिन्दी भाषा की प्रमुख कहानीकार और उपन्यासकार हैं. समकालीन हिन्दी कविता की सर्वाधिक चर्चित कवयित्रियों में उनका विशिष्ट स्थान है. हालाँकि अनामिका जी अंग्रेज़ी की प्राध्यापिका है लेकिन हिन्दी साहित्य के प्रति उनका समर्पण व प्रेम गहरा है. हिंदी काव्य साहित्य को अपनी रचनाओं से समृद्ध करने में उन्होंने कोई कमी नहीं की है.
प्रख्यात आलोचक डॉ. मैनेजर पांडेय ने अनामिका जी के लिए कहा है कि, "भारतीय समाज एवं जनजीवन में जो घटित हो रहा है और घटित होने की प्रक्रिया में जो कुछ गुम हो रहा है, अनामिका की कविता में उसकी प्रभावी पहचान और अभिव्यक्ति देखने को मिलती है."
हिन्दी के प्रसिद्ध कवि व आलोचक दिविक रमेश अनामिका जी के बारे में कहते हैं कि, "अनामिका की बिंबधर्मिता पर पकड़ तो अच्छी है ही, दृश्य बंधों को सजीव करने की उनकी भाषा भी बेहद सशक्त है."
अनामिका जी की रचनाएं आधुनिक स्त्री के जीवन के संघर्ष व संवेदना की पड़ताल करती हुई समकालीन हिंदी कविता का एक मानदंड स्थापित करती हैं. वे अपनी कविताओं में शब्दों का चयन भाव के अनुसार करती हैं. उनकी इस विशेषता से उनकी कविताएं अधिक स्पस्ट सन्देश पहुंचाती हैं. जिससे पाठक आसानी से उनकी कविताओं में अपने जीवन की झलक ढूंढ लेता है. वे बिम्बो का प्रयोग बड़ी ही प्रभावी रूप से करती हैं. उनके कविता संग्रह खुरदुरी हथेलियों की इस रचना में उनकी काव्य की बारीक़ समझ की एक झलक देखने को मिलती है,-
कल एक बर्तन पोंछे वाले जूने से छिदी हुई,
पानी की खाई,
सुन्दर सी, खुरदुरी हथेली
तपते हुए मेरे माथे पर
ठंडी पट्टी सी उतर आयी.
मारे सुख के मै
सिहर सी गयी
मांस-मज्जा
दुनिया की सबसे पानीदार,
नमकीन, कामगार हथेली की?
समकालीन हिंदी साहित्य में अनामिका जी का योगदान उल्लेखनीय है. वे अपनी रचनाओं में न केवल स्त्री विमर्श व स्त्री संघर्ष की बात करती हैं बल्कि आधुनिक समय में स्त्री-पुरुष के मध्य जो एक अदृश्य सी वैचारिक दीवार है, उसको गिराने, स्त्री-पुरुष के रिश्तों की समस्याओं का हल ढूंढने का सफल व सार्थक प्रयास भी करती हुई दिखती हैं. अनामिका जी को हिंदी कविता में विशिष्ट योगदान के लिए राजभाषा परिषद् पुरस्कार, साहित्य सम्मान, भारतभूषण अग्रवाल एवं केदार सम्मान पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है. पढ़िए उनकी कुछ कविताएं.-
[१]
मरने की फुर्सत
ईसा मसीह
औरत नहीं थे
वरना मासिक धर्म
ग्यारह बरस की उमर से
उनको ठिठकाए ही रखता
देवालय के बाहर!
वेथलेहम और यरूजलम के बीच
कठिन सफर में उनके
हो जाते कई तो बलात्कार
और उनके दुधमुँहे बच्चे
चालीस दिन और चालीस रातें
जब काटते सडक पर,
भूख से बिलबिलाकर मरते
एक-एक कर
ईसा को फुर्सत नहीं मिलती
सूली पर चढ जाने की भी।
मरने की फुर्सत भी
कहाँ मिली सीता को
लव-कुश के
तीरों के
लक्ष्य भेद तक?
[२]
(जनम ले रहा है एक नया पुरुष से कुछ अंश )
सृष्टि की पहली सुबह थी वह !
कहा गया मुझसे
तू उजियारा है धरती का
और छीन लिया गया मेरा सूरज !
कहा गया मुझसे
तू बुलबुल है इस बाग़ का
और झपट लिया गया मेरा आकाश !
कहा गया मुझसे
तू पानी है सृष्टि की आँखों का
और मुझे ब्याहा गया रेत से
सुखा दिया गया मेरा सागर !
कहा गया मुझसे
तू बिम्ब है सबसे सुन्दर
और तोड़ दिया गया मेरा दर्पण ।
बाबा कबीर की कविता की माटी की तरह नहीं,
पेपर मैशी की लुगदी की तरह
मुझे "रूंदा" गया,
किसी-किसी तरह मैं उठी,
एक प्रतिमा बनी मेरी,
कोई था जिसने दर्पण की किरचियाँ उठाई
और रोम-रोम में प्रतिमा के जड़ दी !
एक ब्रह्माण्ड ही परावर्तित था
रोम-रोम में अब तो !
जो सूरज छीन लिया था मुझसे
दौड़ता हुआ आ गया वापस
और हपस कर मेरे अंग लग गया !
आकाश खुद एक पंछी-सा
मेरे कन्धे पर उतर आया ।
[३]
मैं एक दरवाज़ा थी
मुझे जितना पीटा गया
मैं उतना ही खुलती गई।
अंदर आए आने वाले तो देखा–
चल रहा है एक वृहत्चक्र–
चक्की रुकती है तो चरखा चलता है
चरखा रुकता है तो चलती है कैंची-सुई
गरज यह कि चलता ही रहता है
अनवरत कुछ-कुछ !
... और अन्त में सब पर चल जाती है झाड़ू
तारे बुहारती हुई
बुहारती हुई पहाड़, वृक्ष, पत्थर–
सृष्टि के सब टूटे-बिखरे कतरे जो
एक टोकरी में जमा करती जाती है
मन की दुछत्ती पर।
[४]
उसकी उमर ही क्या है !
मेरे ही सामने की
उसकी पैदाइश है !
पीछे लगी रहती है मेरे
कि टूअर-टापर वह
मुहल्ले के रिश्ते से मेरी बहन है !
चौके में रहती हूँ तो
सामने मार कर आलथी-पालथी
आटे की लोई से चिड़िया बनाती है !
आग की लपट जैसी उसकी जटाएँ
मुझ से सुलझती नहीं लेकिन
पेशानी पर उसकी
इधर-उधर बिखरी
दीखती हैं कितनी सुंदर !
एक बूंद चम-चम पसीने की
गुलियाती है धीरे-धीरे पर
टपके- इसके पहले
झट पोंछ लेती है उसको वह
आस्तीन से अपने ढोल-ढकर कुरते के !
कम से कम पच्चीस बार
इसी तरह
हमको बचाने की कोशिश करती है।
हमारे टपकने के पहले !
कभी कभी वह
लगा देती है झाड़ू घरों में!
जिनके कोई नहीं होता-
उन कातर वृद्धाओं की
कर देती है जम कर खूब तेल-मालिश।
दिन-दिन भर उनसे बतियाती है जो सो !
जब किसी को ओठ गोल किए
कुछ बोलते देखें गडमड-
समझ लें- वह खड़ी है वहीं
या ऊंघ रही है वहीं खटिया के नीचे-
छोटा-सा पिल्ला गोद में लिये !
बडे़ रोब से घूमती है वह
इस पूरे कायनात में।
लोग अनदेखा कर देते हैं उसको
पर उससे क्या?
वह तो है लोगों की परछाईं !
और इस बात से किसको होगा भला इनकार
आप लांघ सकते हैं सातों समुंदर
बस अपनी परछाईं नहीं लांघ सकते ।
[५]
उन्हें हमेशा जल्दी रहती है
उनके पेट में चूहे कूदते हैं
और खून में दौड़ती है गिलहरी!
बड़े-बड़े डग भरते
चलते हैं वे तो
उनका ढीला-ढाला कुर्ता
तन जाता है फूलकर उनके पीछे
जैसे कि हो पाल कश्ती का!
बोरियों में टनन-टनन गाती हुई
रम की बोतलें
उनकी झुकी पीठ की रीढ़ से
कभी-कभी कहती हैं-
"कैसी हो","कैसा है मंडी का हाल?"
बढ़ते-बढ़ते
चले जाते हैं वे
पाताल तक
और वहाँ लग्गी लगाकर
बैंगन तोड़ने वाले
बौनों के वास्ते
बना देते हैं
माचिस के खाली डिब्बों के
छोटे-छोटे कई घर
खुद तो वे कहीं नहीं रहते,
पर उन्हें पता है घर का मतलब!
वे देखते हैं कि अकसर
चींते भी कूड़े के ठोंगों से पेड़ा खुरचकर
ले जाते हैं अपने घर!
ईश्वर अपना चश्मा पोंछता है
सिगरेट की पन्नी उनसे ही ले
कर।

