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आपके पसंदीदा कवि डॉ. कुमार विश्वास और उनके शिक्षक डॉ. कुंवर बेचैन | शिक्षक दिवस २०२०


"हमारे व्यवहार में हमारा पारिवारिक संस्कार बोलता है और हमारे गाने-गुनगुनाने में हमारी आत्मा का चयन ! आज शिक्षक-दिवस पर मेरे गुरु और मेरे शोध (Ph.D.) निर्देशक, हिंदी गीत परम्परा के मधुगुँजित रसस्नात स्वर आदरणीय डॉ कुँवर बेचैन जी का यह गीत प्रस्तुत है जिसे मैंने पारसाल माँ गंगा के तट पर उड़ती हवाओं के सरसराहट भरे पार्श्व संगीत के साथ गुनगुनाया था ! जैसा वे सुनाते हैं वैसा मनहर तो नहीं ही है पर हाँ जैसा पहली बार इसे सुनकर मेरे मन में यह तैरा था वैसा सा तो है ही!"

- डॉ. कुमार विश्वास



कुमार विश्वास ने शिक्षक दिवस के अवसर पर अपने गुरु जिनसे उन्होंने कविता की शीख ली, उनकी कविता साझा की:


नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ।

मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ।।

मुझे ऊँचाइयों का वो अकेलापन नहीं भाया;

लहर होते हुये भी तो मेरा मन न लहराया;

मुझे बाँधे रही ठंडे बरफ की

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