[Stories and Poetry from the Room of IAS Officers]


जिंदगी कई बार नए रास्ते आपके लिए अचानक खोल देती है। ऐसा लगता है कि उस रास्ते पर आपकी यात्रा पहले से नियत थी। ऐसा क्यों होता है इस पर मतों में भिन्नता हो सकती है। लेकिन यह जब जिसके साथ होता है उसे इसे समझने में थोड़ा वक्त लगता है।


होश आती है तेरे आग़ोश में, शाम ढलती है तेरे ज़रदोज़ में, खिलखिलाती तबस्सुम तू जाम है,


'उडने को उङ जाये नभ में, पर छोडे. नहीं जमीन कलम” की वैचारिक प्रतिबद्धता वाले अप्रतिम गीतकार कविवर गोपाल सिंह “नेपाली” की धरती बेतिया, जो बिहार के उत्तरी छोर पर अवस्थित है, वहीं नीतीश्वर कुमार का जन्म हुआ, वहीं की माटी ने उन्हें प्रगतिशील चेतना और दृढ् इच्छा-शाक्ति के साथ-साथ वह सुकोमल मन भी दिया!


कवि, कहानीकार, गीतकार और गायकी, नीतीश्वर कुमार की रचनात्मकता के कई प्रतिबिम्ब आपको दिखेंगे। 1967 में बिहार के उत्तरी छोर पर एक छोटे से शहर बेतिया में उनका जन्म हुआ. गीत संगीत में रूचि बचपन से ही थी और किताबों की दुनिया के साथ साथ ये दुनिया भी चलती रही। ग्रेजुएशन और पोस्ट- ग्रेजुएशन करने दिल्ली आये. अर्थशास्त्र विषय चुना लेकिन कविता और संगीत में जीवन का अर्थ हमेशा तलाशते रहे। 1996 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में चुने गए और एक क्षमतावान अधिकारी के तौर पर अपनी पहचान बनाई. कहीं भी रहे हों कविता, गीत संगीत का एक नया दौर, एक सिलसिला चलता रहा. स्वयं भी मानते हैं कि आईएएस बनना तो मेहनत, सही रणनीति और संयोग से संभव है लेकिन कविता तो बस, बरबस ही फूटती है। उनकी रचनाओं में आपको कविता का ये रूहानी रूप जगह जगह दिखेगा। कवि और प्रशासनिक अधिकारी होने के साथ साथ नीतीश्वर कुमार अपनी ज़मीन, अपने परिवार से भी बहुत गहराई से जुड़े हैं। उनकी रचनाओं के पहले पाठक और श्रोता उनकी पत्नी और पुत्र- पुत्री ही हैं। इन्हें नीतीश्वर कुमार अपना सबसे बड़ा आलोचक और सबसे बड़ी ताक़त मानते हैं। इन दिनों नीतीश्वर कुमार अपने परिवार के साथ दिल्ली में ही रहते हैं।


उनकी कुछ पंक्तियाँ:


लिखो की तुम हो हमारी तमन्ना,

चिपका लबों पर तुम्हारा ही पन्ना,

जिगर फेंकता है निगाहों से मरहम,

तुम पास हो तो न कहना न सुनना...



ये जमीं बोलती, खुशबुओं की तू मशीन,

जब भी गुजरूं तेरे घर से थरथराती है जमीं...



है अरमान अपना, लिखे खत में सपना,

कि होती इबादत, परिंदों के जैसे...



कह दो ना: जि़ंदगी कई बार नए रास्ते आपके लिए अचानक खोल देती है । ऐसा लगता है कि उस रास्ते पर आपकी यात्रा पहले से नियत थी । ऐसा क्यों होता है इस पर मतों में भिन्नता हो सकती है । लेकिन यह जब जिसके साथ होता है उसे इसे समझने में थोड़ा वक्त लगता है । कुछ ऐसा ही हमारे साथ भी चैदह साल पहले हुआ । मुझे आश्चर्य होता था कि किसी एक विषय पर इतने सारे गीत मुंबईया फिल्मों में लिखे जाते है, लेकिन शायद ही कभी दो गीत सुनने में एक जैसे लगते हैं । गीत लिखना मुझे बहुत ही कठिन लगता था । लेकिन एक दिन अचानक हमसे गीत लिखा गया । उस दिन पता चला कि गीत लिखना कितना आसान है । यह भी समझ आया कि गीत–कविता हृदय की चीज है । दिल, हृदय जो भी कहिए इसे, धड़कता लगातार है यह, और हर नई धड़कन कुछ नया कहती है । तो दिल से निकली कविता तो हर बार नई होगी न । इस संग्रह में आप को चार स्वाद मिलेंगे । पहला वह जो आजकल बंबईया फिल्मों में लिखा जा रहा है । नए शब्द, नई स्पीड के साथ आपको कुछ अच्छा फील देंगे । दूसरा स्वाद वह है जो आपको कुछ चखा चखा सा लगेगा । जो कुछ भी पहले अच्छा आपने सुना है, उन्हीं कुछ शब्दों को लेकर नए अंदाज़ में आगे बढ़ते हुये आज के दौर में कुछ नया कहने की कोशिश है । उम्मीद है आप को स्वादिष्ट लगेगा । इस भाग को हमने नाम ‘सिलसिला’ दिया है । जगजीत सिंह साहब जब से गज़ल को छोड़ गए, तब से गज़ल वहीं ठहरी हुई है । ‘शेर ओ शायरी’ में हमने कोशिश की है कि आज के शब्द, आज की सोच को साथ लेकर गज़ल कही जाये, जो पढ़ने पर आज की स्पीड का अहसास कराये । आखिरी स्वाद सूफि’याना का है जहाँ आपको मुहब्बत को एक्सप्रेस करने के नए शब्द, नए ख्वाब दिखेंगे । ये इश्क ख़्ाुदा, आपके हमसफर से रूबरू कराएगा ।


इस संग्रह में आपको चार स्वाद मिलेंगे। पहला वो जो आजकल बंबईया फिल्मों में लिखा जा रहा है। नए शब्द, नई स्पीड के साथ आपको कुछ अच्छा फील देंगे।