[Stories and Poetry from the Room of IAS Officers]


पहाड़ हमेशा रुका रहा और नदी बह चली,

कभी दोनों ने एक दूसरे की शिकायत नहीं की।


डॉ. सुमिता मिश्रा का जन्म लखनऊ में हुआ। उनके माता-पिता डॉ. एन.सी. मिश्रा एवं डॉ. श्रीमती पी.के. मिश्रा विख्यात डॉक्टर थे। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से बी.ए. और एम.ए. (अर्थशास्त्र) उत्तीर्ण कर विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया। सन् 1990 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में उनका चयन हुआ। पिछले 31 वर्षों से वे हरियाणा सरकार के कई महत्त्वपूर्ण पद और जिम्मेदारियाँ सँभाल रही हैं। अंग्रेजी और हिंदी, दोनों भाषाओं में इनकी कविताएँ कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी ४ किताबें प्रकाशित हो चुकी है, २ हिंदुस्तानी और २ अंग्रेजी में, अंग्रेजी कविताओं का संकलन ‘A Life of Light’ वर्ष 2011 में प्रकाशित हुआ और खूब सराहा गया। तत्पश्चात् कविता-संग्रह ‘जरा सी धूप’ का प्रकाशन वर्ष 2013 में हुआ तथा साहित्य-जगत् में यह संग्रह अत्यंत चर्चित रहा। लेखन के अलावा साहित्य के प्रसार-प्रचार में भी उनकी गहन रुचि है।

वे Chandigarh Literary Society (CLS) की संस्थापक अध्यक्ष हैं, जिसके तत्त्वावधान में अनेक सफल और लोकप्रिय साहित्यिक कार्यक्रम चंडीगढ़ में आयोजित हुए हैं। यह संस्था ‘Literati-Chandigarh Litfest’ का भी पिछले कई वर्षों से सफलतापूर्वक आयोजन कर रही है।


उनकी कविताएं:


[मै निराश नहीं अब भी - सुमिता]

मै निराश नहीं अब भी

पर निशब्द ज़रूर हूँ

मुझे मौसम, गुल , गुलनार और हवाएँ

नहीं दिखती , नहीं महसूस होती


निशब्द ही नहीं , इस दुःख के सैलाब

के आगे निस्तब्द हूँ

इस ख़ौफ़नाक ग़म में ,

इस एकांकी दर्द में

मैं अकेले नहीं


हज़ारों और भी हम जैसे

लड़ रहें हैं चुप चाप

तड़प रहें हैं अंदर अंदर

एक एक जान के लिए


नहीं , हम नहीं डरते अंधेरों से

मगर इस कदर अंधेरे कब हुए हैं कहीं

रोशनी परास्त हम लोग

देख रहें हैं मूक

कहीं इंसानों की जलती चिताएँ

कहीं इंसानियत की जलती मशालें


ये अजब गफ़लत का दौर है

निराशा और आशा एक साथ

पुतलियों में झलकते हैं ,

हम भी रोज़ इन्हीं में

डूबते और उभरते हैं ...


अपनों से इलावा किसी के लिए दुआ

कभी पहले, इस शिद्दत से न की

खुद से बढ़कर , हर बंदे से कभी

यूँ अपनापन और खुदाई मोहब्बत न की ,

इसमें भी हम अकेले नहीं

शायद इस अनहोनी के अज़ाब में

तभी कुछ उम्मीद ज़िंदा है ...



[हम जानते हैं - सुमिता]

दूर से जैसे भी दिखते हों, उनकी हक़ीक़त हम जानते हैं ,

कई आला हस्तियों की असलियत हम जानते हैं


बेवफ़ा न होगा मगर वो फिर मुझे धोखा देगा,

यकीनन, उसकी कैफ़ियत हम जानते हैं


जो बग़ैर हक़ और शक करे उल्फ़त अदा

ऐसी भी एक आध शकसियत हम जानते हैं


आरज़ू ही रही मिट जाने की उसकी बाहों में,

दुशवारियाँ ऐ वक़्त और मोहब्बत हम जानते हैं


हमारी मय्यसर शान ए शौक़त पे न जाना,

इंतेज़ार, मायूसी और ग़ुरबत हम जानते हैं


बेक़सूर थीं सीता मैय्या और रानी द्रौपदी दोनों,

उनकी तरह उठाना तोहमत हम जानते हैं


रिवाजों में खूबसूरत चलन सदियों के मगर

कई दस्तूर से ज़रूरी है बग़ावत हम जानते हैं


कुछ भी साफ़ सुथरा नहीं, मत लड़ो इतना

मटमैले हैं सारे रंग ए सियासत हम जानते हैं


हिम्मत रखो, मुश्किल दौर भी कट जाएगा

वालदेन और ख़ुदा की रहमत हम जानते हैं ..



किताबें / Books:

  • ‘वक्त के उजाले में’ संग्रह की सभी कविताएँ आज के समाज तथा समय के सभी अंतर्विरोधों तथा विसंगतियों पर रोशनी डालती हैं। इन कविताओं में आम आदमी की मुश्किलों, उसकी उम्मीदों तथा आकांक्षाओं के साथ उसकी जिंदगी के जद्दोेजेहद को भी आवाज प्रदान की गई है। इन कविताओं की पृष्ठभूमि में वैश्विक चिंतन के साथ समाज में नैतिक मूल्यों के पतन पर भी रचनाकार ने सार्थक टिप्पणी दर्ज की है। संक्षेप में, सहज, सरल, सुबोध काव्य भाषा में रचित ये कविताएँ मानवीय अनुभूति की सूक्ष्म तथा आत्मीय अभिव्यक्ति हैं तथा जीवन के तपते रेगिस्तान में शीतल मरूद्यान सी प्रतीत होती हैं।
  • ज़रा सी धूप
  • A Life of Light
  • Petrichor (Book): “What strikes me as significant are her themes and their handling. Though, like other poets she dwells on love, transitoriness of life and death, there is a distinct indianness in the way she approaches these and expresses herself. Her tone is personal, her language is rich and confident, her symbols are evocative and timeless. Unlike much of ‘modern’ poetry, which seeks to be obscure, there is an eloquent directness in her writing which captures the reader attention. These poems touch upon love, the persistence of hope and the rediscovery of joy with a deft and light touch.” —Khushwant Singh.

[Poetry & Nature - Sumita Misra]

There is a forest in my mind

Tall trees kissing azure skies,

Some bramblewood,

Electric wildflowers growing

Drunken amber sunsets

And the fingers of my branches

Tickling golden dawns

That’s where i live.

And perforce venture out

To tackle a truckload

Of mundane tasks.

But if you ever search for me,

Now you know where.

In a deep green place

Nestled between mountains,

Where the trees speak in sighs,

Where past & present blur,

Where there is only

The whisper of infinity

In the trickle of a small silver stream

Over ancient rocks and moss,

That’s where you’ll find me.


[The Thought of You - Sumita Misra]

Your voice echoes

In all the leafy flowering parts

Of an asphalt city.

Your words swim

In my head as it grapples,

With problems much larger

Than me or any of us.

Your cascades of expression

Slide in the ridges of my brain ,

They feed my soul -

As a pollen laden bloom

Feeds butterflies and insects.


I do not need the proximity

Of either. The thought

Of you hovers so delicately

In me, a perpetual crystal

Catching light,

That those bright moments

Give me the will

To try again. To hope again.

Your memory is a means

To recall and renew myself.


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