"सरल होना साधारण होना नहीं है!"
~ मंगलेश डबराल
मंगलेश डबराल केवल एक लेखक नहीं बल्कि भारतीय साहित्य और समाज के लिए पूरी किताब थे, साहित्य को ईमानदार साहित्यकार बहुत कम मिलते है, मंगलेश डबराल शायद आधुनिक साहित्य में आखिरी ईमानदार लेखक थे! युवा साहित्यकारो को उनसे साहित्य के साथ साथ यह भी सीखना चाहिए कलम की ताकत होते हुए ईमानदार कैसे रहते है, लेखनी को ईमानदारी कैसे सिखाते है!
साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता, हिंदी भाषा के प्रख्यात लेखक और कवि मंगलेश डबराल का कार्डियक अरेस्ट की वजह से निधन हो गया है. उनकी हालत पिछले कुछ दिनों से नाजुक बनी हुई थी. गाजियाबाद के वसुंधरा के एक निजी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था. बाद में हालत बिगड़ने पर उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया था. एम्स में उन्होंने आखिरी सांस ली. मंगलेश डबराल समकालीन हिन्दी कवियों में सबसे चर्चित नाम हैं. मंगलेश डबराल मूलरूप से उत्तराखंड के निवासी थे. उनका जन्म 14 मई 1949 को टिहरी गढ़वाल, के काफलपानी गांव में हुआ था. उनकी शिक्षा-दीक्षा देहरादून में ही हुई थी. दिल्ली में कई जगह काम करने के बाद मंगलेश डबराल ने मध्यप्रदेश का रूख किया. भोपाल में वह मध्यप्रदेश कला परिषद्, भारत भवन से प्रकाशित होने वाले साहित्यिक त्रैमासिक पूर्वाग्रह में सहायक संपादक रहे. उन्होंने लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाले अमृत प्रभात में भी कुछ दिन नौकरी की. वर्ष 1963 में उन्होंने जनसत्ता में साहित्य संपादक का पद संभाला. उसके बाद कुछ समय तक वह सहारा समय में संपादन कार्य में लगे रहे. आजकल वह नेशनल बुक ट्रस्ट से जुड़े हुए थे. मंगलेश डबराल के पांच काव्य संग्रह (पहाड़ पर लालटेन, घर का रास्ता, हम जो देखते हैं, आवाज भी एक जगह है और नये युग में शत्रु) प्रकाशित हुए हैं.
उनकी याद में कविशाला टीम ने कुछ महत्वपूर्ण बाते एकत्रित की हैं:
- ‘मधुशाला एक साधारण, मनोरंजक लेकिन एक सेकुलर कविता थी.’ ~ मंगलेश डबराल
- ‘हरिवंश राय बच्चन की रचनाएं छायावाद और नई कविता के बीच अपना स्थान बनाती हैं. वे साधारण लोगों की संवेदनाओं को समझते थे, और पहले से चली आ रही क्लिष्ट भाषा की कविताओं के मिथक को तोड़ते हुए आम बोल-चाल वाली कविताओं को प्रचलन में लाने का श्रेय भी बच्चन को ही जाता है.’ ~ मंगलेश डबराल
- "नींद की अहमियत इस बात से जाहिर है कि उसके बिना हम अपने को जागा हुआ नहीं कह सकते। भूख से परेशान लोग अक्सर नींद से काम चलाते हैं!" ~ मंगलेश डबराल
- 'विष्णु खरे ने जितना काम किया, जितनी विधाओं में किया, उसे देखकर आप विस्मय में पड़ सकते हैं! मैं तो यही कहूंगा कि वे कबीर, निराला और मुक्तिबोध के बाद हिंदी के आखिरी मूर्तिभंजक थे, जो अपने शब्दों के साथ हमेशा हम लोगों के बीच रहेंगे!' ~ मंगलेश डबराल
मंगलेश डबराल जनसत्ता के साहित्य संपादक रह चुके हैं. इसके अलावा, उन्होंने कुछ समय तक लखनऊ से प्रकाशित होने वाले अमृत प्रभात में भी नौकरी की. इस समय वे नेशनल बुक ट्रस्ट से जुड़े हुए थे. मंगलेश डबराल को साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिल चुका था. साहित्य जगत से उनको नमन किया और श्रद्धांजलि दी :
कवि लेखक चिंतक पत्रकार मंगलेश डबराल जी के असमय निधन की सूचना से स्तब्ध हूँ। जनपक्षधरता के साथ ही सरलता और मृदुभाषी छवि के लिए उन्हें सदा याद किया जाएगा। श्रद्धांजलि।
— Manish Sisodia (@msisodia) December 9, 2020
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— वरुण (@varungrover) December 9, 2020
रेल में
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एकाएक आसमान में
एक तारा दिखाई देता है
हम दोनों साथ-साथ
जा रहे हैं अंधेरे में
वह तारा और मैं।
~ मंगलेश डबराल
(आज चले गए। हमारे बहुत प्यारे रचनाकार मंगलेश डबराल। श्रद्धांजलि।) pic.twitter.com/4CvIa7nnFt
दुखद ख़बर!
— Rajkamal Prakashan (@RajkamalBooks) December 9, 2020
यशस्वी कवि मंगलेश डबराल नहीं रहे...
हमारी स्मृतियों और अपने शब्दों में वे हमेशा रहेंगे...
राजकमल प्रकाशन समूह दुख की इस घड़ी में उनके परिवार और पाठकों-प्रशंसकों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करता है।
श्रद्धांजलि pic.twitter.com/rwZIFNaf9B
मंगलेश डबराल का जाना...
— Dr Hari Om (@dr_hariom_ias) December 9, 2020
सिर्फ़ एक बड़े कवि का जाना नहीं
नाउम्मीदी के घटाटोप में उम्मीद बन दूर से टिमकने वाली सौम्य रौशनी का बुझ जाना..#manglesh pic.twitter.com/w3kRMuHsbG
-मंगलेश डबराल
— Dr. Jitendra Kumar Soni (@Jksoniias) December 9, 2020
जब यह ट्वीट लिखा था, तो सहज वाक्य समझ लिख दिया था। आज कविशाला पर देखा तो ज्ञात हुआ कि यह कथन किनका है।
इस निपट अज्ञानता के लिए माफ़ी!
जीवन में कई बार बहुत कुछ इतना लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ मिल जाता है कि लगता है कोई बात अवचेतन से चेतन हुई है।
विनम्र श्रद्धांजलि
अलविदा श्री मंगलेश डबराल विदा कवि
— Dr Kumar Vishvas (@DrKumarVishwas) December 9, 2020
“कितने सारे पत्ते उड़कर आते हैं
चेहरे पर मेरे बचपन के पेड़ों से
एक झील अपनी लहरें
मुझ तक भेजती है
लहर की तरह काँपती है रात
और उस पर मैं चलता हूँ
चेहरे पर पत्तों की मृत्यु लिए हुए
लोग जा चुके हैं
रोशनियाँ राख हो चुकी हैं..!” pic.twitter.com/dHAKCcCafc

