[प्रसिद्ध गीतकार राजेन्द्र राजन का निधन]
जीवन-मरण के फ़र्क़ में उलझा हुआ था मैं,
तुमने बिछड़के मौत का चेहरा दिखा दिया !!
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21 वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया. राजन अपनी प्रेम की चादर अभी बुन ही रहे थे कि निष्ठुर काल ने उनके जीवन में तूफान ला दिया. उनकी हमसफर अपनी अनंत यात्रा पर चली गयी. राजन भीतर से काफी टूट गए. उनके भीतर, व्यवस्था के प्रति आक्रोश, पारिवारिक व सामाजिक विद्रूपताओं से उपजी वितृष्णा और स्वयं के अस्तित्व को मिली प्रतिकूलताओं से जन्मी अभिव्यक्तियां जो प्रायः शुरू में गद्य रुप में बाहर आ रही थी, वह काव्य का आकार लेने लगी. तब उनकी क़लम ने लिखा-
चूम लूँ तुझको, लगे आराधना कुछ भी नहीं
तू रहे तो जग रहे, तेरे बिना कुछ भी नहीं.
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केवल दो गीत लिखे मैंने
इक गीत तुम्हारे मिलने का
इक गीत तुम्हारे खोने का
केवल दो स्वप्न बुने मैंने
इक स्वप्न तुम्हारे जगने का
इक स्वप्न तुम्हारे सोने का
केवल दो रंग चुने मैंने
इक रंग तुम्हारे हँसने का
इक रंग तुम्हारे रोने का
मूलरूप से शामली के एलम कस्बा निवासी 65 वर्षीय गीतकार राजेंद्र राजन 1980 में सहारनपुर में आकर रहने लगे। उनके बड़े पुत्र पल्लव एयरफोर्स से सेवानिवृत्त होकर बैंक में कार्यरत हैं जबकि छोटे पुत्र प्रशांत एक कंपनी में जॉब करते हैं। राजन के पुत्र प्रशांत ने बताया कि दो दिन पहले लखनऊ में एक कवि सम्मेलन से आने के बाद से उनके पिता की तबियत कुछ खराब थी। इसके चलते उन्होंने मुजफ्फरनगर में डॉ. पीके शर्मा से जांच कराई, जिसमें उनके फेफड़ों में इंफेक्शन आया था, साथ ही हल्का नमोनिया भी था। इसके चलते उनकी कोरोना जांच भी कराई गई थी। उनकी आरटीपीसीआर रिपोर्ट भी गुरुवार दोपहर को आने की संभावना है। लगाई थी कोरोना की पहली डोज राजन के पुत्र प्रशांत ने बताया कि उनके पिता कोरोना वैक्सीन की पहली डोज लगवा चुके थे। जबकि अभी दूसरी डोज लगवानी बाकी थी। इसी बीच में उनकी तबीयत बिगड़ गई। और इनकी मौत हो गई। इस घटना से साहित्य जगत में शोक की लहर है।
राजेंद्र राजन पिछले 40 वर्षों से साहित्य जगत में कार्यरत थे। इनके लिखे कई गीत और ओर कविताएं काफी प्रचलित रहीं। दूर्दशन, आकाश्वाणी के साथ ही देश-विदेश के मंचों पर भी ये कविता पाठ कर चुके थे। अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति यूएसए से इनकों अमेरिका के 16 शहरों में हुए कवि सम्मेलन में भी कवि पाठ किया था। हिंदी उर्दू एकेडमी से साहित्यिक पुरुस्कार, कन्हैया लाल मिश्र पुरस्कार, महादेवी पुरस्कार व साहित्य भूषण पुरस्कार भी मिल चुका है।
गीतकार राजेंद्र राजन का एक ताजा गीत:
मौसम में पुरवाई जैसे
सूरज में गरमाई जैसे
ढकी-छुपी सी तुम हो मुझमें
काया में परछाई जैसे
नदिया को सागर का जैसे
शब्दहीन उल्लास पुकारे
किसी यौवना के पल-पल में
उम्र, सखी-सी केश सँवारे
बचपन में तरुणाई जैसे
होली में भौजाई जैसे
ढकी-छुपी सी तुम हो मुझमें
काया में परछाई जैसे
मन आवारा निश्छल जैसे
सुख-दुख में कुछ भेद न माने
वो सबको ही अपना समझे
भले-बुरे को क्या पहचाने
कपटी मन चतुराई जैसे
सागर में गहराई जैसे
ढकी-छुपी सी तुम हो मुझमें
काया में परछाई जैसे
मन का पंछी दिशाहीन हो
और गगन हँसता हो उस पर
कहाँ ठिकाना उसे मिलेगा
वृक्ष नही उगते हैं नभ पर
शून्य सदन तन्हाई जैसे
तुलसी में चौपाई जैसे
ढकी-छुपी सी तुम हो मुझमें
काया में परछाई जैसे।

