[रथ चढ़ आए जगन्नाथ! - शास्त्री कोसलेंद्रदास] बरसाती आषाढ महीने में उमड़ते—घुमड़ते बादलों के बीच परमात्मा अपने भक्तों से मिलने धरा पर उतरते हैं। ब्रह्म और जीव मिलन के इस अद्भुत उत्सव में वे न केवल निज मंदिर से बाहर आते हैं बल्कि अपने सर्वसुलभ स्वरूप को प्रकट करते हैं। स्वयं की सत्ता भक्तों के हाथ सौंप देते हैं। पर वे उतरते सदा परम पवित्र में हैं, जहां कोई त्राहि नहीं, आत्र्तनाद नहीं और खूनी आक्रामक झपट्टा नहीं। इसलिए वे अपने रथ में बैठकर आनंद विहार करते हैं, जिन रथों को खींचते हैं उनके भक्त। भक्त भी बिना किसी ऊंच—नीच और छोटे—बड़े के भेदभाव के। वे सबके हैं इसलिए सभी को समान रूप में उपलब्ध हैं। जिस स्थान पर यह दुर्लभ अलौकिक मनोहारी दृश्य उतरता है, वह है पुराणोक्त महिमा से मंडित भूमि ‘पुरी’।
पुरी में परमात्मा श्रीकृष्ण ही जगन्नाथ स्वरूप में विराजमान हैं। स्कंद पुराण कहता है, ‘यह भूमि धन्य है, जहां संसार के स्वामी स्वयं शरीर धारण करके न केवल बैठे हैं बल्कि उन्होंने इसे अपने ही नाम से ‘जगन्नाथ पुरी’ के रूप में प्रसिद्ध कर दिया है।’ अथर्ववेद से लेकर ब्रह्म पुराण तक सारे ग्रंथों में भगवान जगन्नाथ की अनुपम महिमा का वर्णन है। जगन्नाथ शब्द का तात्पर्य है, संसार के स्वामी। वे भगवान जगन्नाथ ही प्रतिवर्ष आषाढ मास के शुक्ल पक्ष यानी उजियाले पखवाड़े की द्वितीया तिथि को बड़े भाई बलराम और छोटी बहन सुभद्रा के साथ रथ में विराजमान होकर जीव और ईश्वर की दूरी को पाट देते हैं। हर कोई उनके लकड़ी से बने रथ को अपनी शक्ति के अनुसार खींच कर उसे आगे बढ़ाता है। वे कभी रुक जाते हैं तो कभी आगे बढ़ जाते हैं। खुले आसमान के नीचे वर्षा में भीगते हैं तो कभी तेज धूप में गहरे चमकते हैं। फूल-पंखुडिय़ों के सौरभ के बीच भगवान जगन्नाथ प्रतिवर्ष अपनी यात्रा पर निकलते हैं और मानव समाज को आनंद प्रसाद बांटते हैं।
सत्यं परं धीमहि
भारतीय संस्कृति की आधारशिला एक शाश्वत चेतना है। उस चेतना का सूत्र भागवत महापुराण में है, ‘सत्यं परं धीमहि’ यानी जो परम सत्तावान है, वह सत्य है। वह सत्य ही व्यापक रूप में परमात्मा है और परमात्मा के अणु अंश में जीव। धर्म साधना ‘सत्यं परं धीमहि’ पर चलती है, जो बहुरंगी है। उस भक्ति—साधना के नौ रूप श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन भागवत महापुराण में हैं। यह सुदीर्घ काल से चली आ रही सगुण भक्ति परंपरा का विस्तार है। इसमें भगवान के चैतन्य विग्रह की विभिन्न भावों से कई साधनों और सामग्रियों से सेवा की जाती है। चैतन्य विग्रह यानी मंत्रों से प्राण प्रतिष्ठित प्रतिमा। भक्ति संवेदना में भगवान की प्रतिमा को ‘ठाकुरजी’ कहा जाता है, जो शताब्दियों पुरानी परंपरा है। भक्ति पंरपरा के महान संत रामानुजाचार्य ने ईश्वर के पांच भेद बताए, जिनमें एक ‘अर्चावतार’ है। अर्चावतार का मतलब घर—मंदिरों में विराजमान भगवान की प्रतिमा से है। ये अर्चावतार विग्रह भक्त के अधीन होते हैं। भक्तों के इनसे बोलने—सुनने और खाने—खिलाने जैसे सारे संबंध होते हैं। अर्चावतार भक्तों से साक्षात सेवा ग्रहण करते हैं। इसी भक्ति धारा में भगवान जगन्नाथ अर्चावतार रूप में रथ पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देते हैं।
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को रथ यात्रा
भगवान जगन्नाथ का विश्व प्रसिद्ध रथ महोत्सव आषाढ शुक्ल द्वितीया को होता है। इस त्योहार को रथ यात्रा, गुंडिचा यात्रा एवं घोष यात्रा कहा जाता है। महोत्सव की शुरूआत में देवताओं को मंदिर से बाहर लाया जाता है और उन्हें संबंधित रथों में विराजमान किया जाता है। देवताओं को मंदिर के गर्भगृह से बाहर लाकर पारंपरिक धार्मिक विधान से रथों तक ले जाया जाता है। सबसे पहले चक्रराज सुदर्शन, उसके बाद हलधर बलभद्र फिर सुभद्रा और सबसे अंत में भगवान जगन्नाथ।
तीन रथ, तीन नाम
तीन रथों के भिन्न—भिन्न नाम हैं। जिस रथ में भगवान जगन्नाथ विराजते हैं, वह ‘नंदीघोष’ नाम से जाना जाता है। भगवान बलभद्र के रथ को ‘तालध्वज’ कहते हैं। सुभद्रा ‘देवदलन’ रथ में विराजती हैं। चक्रराज सुदर्शन के विग्रह को सुभद्रा के साथ उनके रथ में विराजमान किया जाता है। भगवान जगन्नाथ के प्रतिरूप में मदनमोहन भगवान को जगन्नाथ के रथ में स्थान दिया जाता है। धातु बने भगवान श्रीराम और कृष्ण के दो मधुर यानी छोटे विग्रह बलभद्र के रथ में बिठाए जाते हैं। इस प्रकार वास्तव में सात देवता जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा, सुदर्शन, मदनमोहन, राम और कृष्ण को तीन रथों पर बैठाया जाता है और उन्हें ‘गुंडिचा घर’ तक ले जाया जाता है। यह जगन्नाथ मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। बलभद्र का रथ सबसे पहले खींचा जाता है, बाद में सुभद्रा और अंत में भगवान जगन्नाथ। साथ में ‘जय जगन्नाथ’ का आकाशस्पर्शी जयघोष।
पांचवें दिन हेरा पंचमी
यदिपहले दिन रथ ‘गुंडिचा घर’ तक नहीं पहुंच पाते हैं, तो उन्हें अगले दिन फिर से खींचा जाता है। सप्ताह भर तक ‘गुंडिचा घर’ में विराजे रहने के बाद नौवें दिन देव विग्रह फिर से जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार क्षेत्र में लाए जाते हैं। इस बीच पांचवें दिन एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान होता है, हेरा पंचमी। यह पर्व अपने भाई-बहन के साथ रथारूढ होकर मंदिर छोड़ आए भगवान से नाराज हुई माता महालक्ष्मी से जुड़ा है। महाप्रभु से नाराज महालक्ष्मी सखियों के संग शरधा बाली (श्रद्धावलि) तक आती हैं। लक्ष्मी की उत्सव प्रतिमा को गाजे—बाजे के साथ गुंडिचा मंदिर तक ले जाया जाता है। जहां भगवान जगन्नाथ द्वारा रथयात्रा में अपने को साथ न ले जाने से गुस्साई लक्ष्मी प्रतीक के तौर पर नन्दिघोष रथ का एक हिस्सा तक तोड़ देती हैं। मानवीय लीला के लिए प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ से जुड़ा हेरा पंचमी महत्वपूर्ण उत्सव है। रथ को तोडऩे के बाद महालक्ष्मी पुन: श्रीमंदिर लौट आती हैं। महालक्ष्मी का विमान हेरा साही होते हुए मंदिर लौटने के कारण इस तिथि को ‘हेरा पंचमी’ कहा जाता है।
देवशयनी एकादशी पर आराधना भोग
दसवें दिन आषाढ की शुक्ल पक्ष एकादशी होती है। इस दिन शाम को देवताओं को सोने के आभूषणों से सुसज्जित किया जाता है। उन्हें सिंहद्वार क्षेत्र में लाने के लिए भव्य और आकर्षक कपड़े पहनाए जाते हैं। इसी दिन वैदिक और पौराणिक अनुष्ठान होता है। यह दिन हरिशयनी एकादशी है, जिसे आम बोलचाल में देवशयनी एकादशी बोलते हैं। ‘शतपथ—ब्राह्मण’ के अनुसार इस दिन से चातुर्मास व्रत—अनुष्ठान शुरू होता है। देवताओं का शयन काल प्रारंभ होता है, जो चार महीने चलता है। बारहवें दिन भगवान जगन्नाथ को ‘आराधना भोग’ भेंट किया जाता है। इसमें उन्हें मीठा पेय चढ़ाया जाता है। अगले दिन की शाम को अनगिनत भक्तों की भीड़ के बीच पारंपरिक जुलूस में देवताओं को मंदिर में ले जाकर स्थापित किया जाता है।
भिन्न-भिन्न रंगों में रंगे रथ
वंशानुगत विशेषाधिकार प्राप्त लोगों द्वारा बलभद्र, सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ के लिए तीन रथों का निर्माण हर साल नई लकड़ी से किया जाता है। भगवान जगन्नाथ का रथ पैंतालीस फीट ऊंचा और पैंतालीस फीट चौड़ा होता है, जिसमें सोलह पहिए होते हैं। प्रत्येक का फैलाव सात फीट का है। यह रथ लाल और पीले कपड़ों से अलंकृत होता है। भगवान जगन्नाथ को कृष्ण ही माना जाता है, इस नाते उन्हें ‘पीतांबर’ नाम से पुकारा जाता है। वे रथ में सुनहरे पीले वस्त्र धारण कर विराजमान होते हैं। यहां तक कि रथ की छतरियों को पीली बंदनवारों और ध्वजा—पताकाओं से सजाया जाता है। इस मनोहारी उत्सव का नजारा कई दिनों पहले से जम जाता है। भगवान बलभद्र के तालध्वज रथ पर लगे झंडे में वृक्ष की आकृति होती है। चौदह पहिये होते हैं। प्रत्येक का व्यास सात फीट होता है। रथ लाल और नीले कपड़े से ढंका होता है, जिसकी ऊंचाई चौवालीस फीट होती है। बारह पहियों वाला सुभद्रा का रथ तियालीस फीट ऊंचा होता है। इस रथ को लाल और काले कपड़े से सुसज्जित किया जाता है, जिसे पारंपरिक रूप से लोग शक्ति और मातृका देवी के साथ जोड़ते हैं। शक्ति का रंग लाल और योगिनियों का वर्ण काला है। प्रत्येक रथ में भिन्न—भिन्न सारथी होते हैं। भगवान जगन्नाथ के सारथी मातलि हैं। बलभद्र के दारुक और सुभद्रा के सारथी अर्जुन होते हैं।
आनंद-उत्सव बीच जगन्नाथ
भगवान बलभद्र और जगन्नाथ को सुंदर मौसमी फूलों से सजाया जाता है। ये फूल श्वेत, गुलाबी और कमल के फूलों से बने होते हैं, जो अर्ध-गोलाकार आकृति में बांस के फ्रेम से सजाए जाते हैं। मंदिर से सिंहद्वार पर सबसे पहले सुदर्शन आते हैं, जो सुभद्रा के रथ पर अपना स्थान लेते हैं। उनके बाद भगवान बलभद्र। भगवान जगन्नाथ और बलभद्र की छोटी बहन सुभद्रा पीली-सुनहरे रंग की पोशाक पहनकर आती है। सबसे अंत में भगवान जगन्नाथ शाही जुलूस में पधारते हैं। भगवान के जुलूस के सामने मृदंग और अनेक ताल वाद्यों के साथ ओडिसी नर्तक पारंपरिक नृत्य की अप्रतिम मनोहारी प्रस्तुति देते हैं, जो परमात्मा को रिझाने का प्रयास है। भक्त लयबद्ध संकीर्तन और नृत्य करते हैं, जो उन्हें चैतन्य की आभा से आच्छादित होने पर सुध-बुध भुला देता है। यह निरतिशय आनंद का उत्सव है, जहां सारी बाधाओं और विघ्नों से दूर जाकर शक्तिशाली आंतरिक आनंद का वातावरण देखते ही बनता है।
बारह साल में नवशरीर-उत्सव
रथ यात्रा आने—जाने वाला काल मात्र नहीं है बल्कि यह पूरा अनुष्ठान है, जो लगभग वर्ष भर चलता है। परंपरागत रूप से माघ शुक्ल पंचमी को मनाई जाने वाली बसंत पंचमी के दिन से रथ निर्माण के लिए लकडिय़ों का आना शुरू हो जाता है। शगुन के तौर पर मंदिर में लकड़ी का पहला ग_र वसंत पंचमी को ही आता है। पर रथों का निर्माण अक्षय तृतीया से शुरू होता है। इस प्रकार पूरे दो महीनों में रथ बनकर तैयार हो जाते हैं। रथ यात्रा से पहले कोई भी जगन्नाथ मंदिर में जाए तो मंदिर के सामने लकडिय़ों की बड़ी-बड़ी पट्टियां हर जगह पड़ी मिल जाती हैं। लकड़ी से बने घोड़ों को रथों में जोड़ा जाता है। यात्रा के लिए हर साल नए रथ बनाए जाते हैं। पर रथों में लगने वाले लकड़ी के घोड़े, सारथी और रथों को सजाने वाले छोटे देवताओं को बारह वर्षों में एक बार बनाया जाता है। भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की लकड़ी की प्रतिमा बारह सालों में एक बार बनाई जाती है। इस प्रकिया के अनुष्ठान को ‘नवशरीर—उत्सव’ कहा जाता है। यह समारोह पिछली बार 2015 में मनाया गया था। इन लकडि़य़ों की व्यवस्था सरकारी स्तर पर होती है। मंदिर प्रशासन लकड़ी के लिए वन विभाग को लिखित सूचना देता है। सरकारी सहयोग से रथ निर्माण के लिए लकडि़य़ों की आवक होती है। पर यह अलौकिक चमत्कार है कि भगवान जगन्नाथ समेत दूसरी प्रतिमाओं के निर्माण के लिए उपयोग में आने वाली काष्ठ समुद्र में बहकर खुद ही यथासमय किनारे लग जाती है।
पीढिय़ों से परंपरागत तौर पर रथ बना रहे कारीगर इसे अपना सौभाग्य मानते हैं। रथ निर्माण में शामिल बिष्णु महापात्रा बताते हैं, ‘लकड़ी के भारी—भारी टुकड़ों से रथ बनाने के काम में एकाग्रता जरूरी है। बहुत लोगों की मेहनत रथ यात्रा का हिस्सा होती है। यह श्रमसाध्य जरूर है पर सैंकड़ों साल पुरानी परंपरा होने से बहुत ही आनंददायक भी है।’
इंद्रद्युम्न ने बनाया जगन्नाथ मंदिर
ऐतिहासिक मान्यता है कि मूल रूप से ओडिशा में विश्वावसु नामक आदिवासी भगवान नीलमाधव की पूजा करता था। इस बारे में सुनकर राजा इंद्रद्युम्न ने इन देवता के शास्त्रीय स्वरूप का पता लगाने के लिए अपने ब्राह्मण पुरोहित विद्यापति को वहां भेजा। इंद्रद्युम्न को यह ज्ञान हुआ कि नीलमाधव के रूप में ये साक्षात भगवान कृष्ण हैं। भक्ति-भाव से ओतप्रोत होकर इंद्रद्युम्न ने जगन्नाथ मंदिर का निर्माण करवाया, जो कालांतर में जीर्ण हो गया। अभी जो मंदिर है, उसका निर्माण 12वीं शताब्दी में राजा अनंत बर्मन ने करवाया। विद्वानों के अनुसार राजा अनंत बर्मन ने मंदिर का निर्माण शुरू किया, जो उनके वंशज अनंगभीम देव (तृतीय) के समय पूरा हुआ। कुछ विद्वानों के मत में मौजूदा जगन्नाथ मंदिर का निर्माण किसने किया, इस पर अभी बहस जारी है। ऐतिहासिक रूप में मंदिर से संबंधित विश्वसनीय सामग्री नौवीं शताब्दी से उपलब्ध हैं, जब जगद्गुरु शंकराचार्य ने पुरी का दौरा किया। तब शंकराचार्य ने पुरी में गोवर्धन मठ को पूर्वी धाम के रूप में स्थापित किया, जहां अभी स्वामी निश्चलानंद सरस्वती रहते हैं।
रानी गुंडिचा ने शुरू की रथ यात्रा
पुरीस्थित जगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रो. प्रभातरंजन महापात्रा के अनुसार किंवदंती है कि भगवान जगन्नाथ अपने भाई—बहन के साथ प्रतिवर्ष रथ पर बैठकर अपनी चाची से मिलने जाते हैं। रथों को मंदिर से गुंडिचा मंदिर लाया जाता है। यही वह स्थान है जहां कहा जाता है कि जगन्नाथ ने इस स्वरूप को धारण किया था, जिसमें आज तक उनकी पूजा की जाती है। भगवान जगन्नाथ का रथ आठ दिनों तक गुंडिचा मंदिर में ही रुका रहता है। इस मंदिर का नाम राजा इंद्रद्युम्न की पत्नी रानी गुंडिचा के नाम पर रखा गया है। रानी गुंडिचा के बारे में माना जाता है कि उन्होंने ही रथ यात्रा उत्सव शुरू किया था। इसलिए हर साल रथ यात्रा से पहले गुंडिचा मंदिर को अपने वार्षिक अतिथियों की आवभगत के लिए सजाया जाता है।
राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के प्रो. रमाकांत पांडेय का मानना है कि जगन्नाथ रथ यात्रा सनातन पंरपराओं के मिलन का महोत्सव है। संस्कृत साहित्य में जगन्नाथ भगवान का ऐसा मनोहारी वर्णन है, जिसमें सारी भाव धाराएं आकर मिल जाती है। स्कंदपुराण के उत्कलखंड से लेकर अनेक संस्कृत विद्वानों ने भगवान जगन्नाथ पर प्रचुर मात्रा में लिखा है। 12वीं शताब्दी में महाकवि जयदेव ने यहीं ‘गीतगोविन्दम्’ लिखकर नई काव्य-गीति-विधा रागकाव्य की परंपरा डाली। पुरी के राजा पुरुषोत्तमदेव ने नीलाद्रिविलास:, मुक्तिचिंतामणि एवं गोपालार्चन पद्धति ग्रंथ लिखे। हलधर मिश्र का वसन्तोत्सव महाकाव्य, नरसिंह कवि का अभिनवजगन्नाथ प्रस्तावम्, नीलांबर आचार्य का चन्दनयात्रा चम्पू, विश्वनाथ महापात्र का कांचीविजय महाकाव्य, गणेश्वर रथ वाचस्पति का श्रीपुरुषोत्तमचरित महाकाव्य एवं जगन्नाथदास के गोपालार्चन पद्धति और नित्यगुप्तचूडामणि प्रसिद्ध हैं। मंदिर में वैष्णव एवं तांत्रिक, दोनों विधा से पूजा होती है। मंदिर में ‘नीलाद्रिनाथपूजाविधि’ के अनुसार भगवान की सेवा की जाती है। इतना ही नहीं संस्कृत भाषा में सौ से अधिक ग्रंथ पौराणिक स्वरूप में भगवान जगन्नाथ पर लिखे गए हैं।
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रथ यात्रा महोत्सव की तैयारी
रथ यात्रा का सरकारी बजट इस बार लगभग १० करोड़ है।
हर साल लगभग ९०० पेड़ रथ बनाने में काम लिए जाते हैं, जिनमें चार प्रकार के पेड़ों का ही उपयोग किया जाता है।
२०० लोग २ महीने तक लगातार तीन रथों का निर्माण करते हैं, जो काम अक्षय तृतीया से शुरू होता है।
मंदिर प्रशासन रथों के पहियों को औद्योगिक घरानों को बेच देता है और बाकी बची लकड़ी का उपयोग रसोई में भोग बनाने में होता है।
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मंदिर के रहस्य, जो हैरान कर देंगे
१. मंदिर के पास हवा की दिशा हैरान करती है। समुद्री तटों पर हवा समुद्र से जमीन की तरफ चलती है लेकिन, पुरी में हवा जमीन से समुद्र की तरफ चलती है।
२. मंदिर के शिखर की कोई छाया या परछाई कभी नहीं होती है।
३. जगन्नाथ मंदिर के ऊपर कोई भी पक्षी उड़ता हुआ नहीं देखा गया। मंदिर के ऊपर से विमान उड़ाना भी निषेध है।
४. जगन्नाथ मंदिर के रसोईघर को दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर माना जाता है। मान्यता है कि कितने भी श्रद्धालु मंदिर आ जाए, लेकिन अन्न कभी खत्म नहीं होता।
५. मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं। यह प्रसाद मिट्टी के बर्तनों में लकड़ी से पकाया जाता है। इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान पहले पकता है फिर नीचे की तरफ से एक के बाद एक प्रसाद पकता जाता है।
६. इस मंदिर के शिखर पर लगे सुदर्शन चक्र को कहीं से भी देखें तो वह सीधा ही नजर आता है।
७. मंदिर के ऊपर लगा ध्वज हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता रहता है।
८. मंदिर में मूर्तियां काष्ठ की बनी हुई हैं। हर बारहवें वर्ष में ये नई बनाई जाती हैं, लेकिन इनका आकार और रूप वही रहता है।
९. मंदिर सातवीं सदी में बनवाया गया, जो अब तक तीन बार खंडित हुआ है। 1174 ईस्वी में महाराज अनंगभीम देव ने इसका जीर्णोद्धार करवाया।
IMAGE: [On the auspicious occasion of Ratha Yatra, our students Subhashree Mishra and Sasmita Nayak are creating sand animation.] From Sudarsan Pattnaik Twitter

