[Kavishala Daily] शेरो-शायरी हर किसी को भाती है. चाहे मुहब्बत में डूबे जवां दिल हो, महबूब की याद में तड़पते प्रेमी युगल या फिर ज़िन्दगी के गम से बोझिल कोई आम इंसान, शायरी हर किसी को अपनी ओर आसानी से आकर्षित कर लेती है. जब कोई एक शायर कहीं शेर कह रहा होता है तो हम तमाम रंजो गम भूलकर शायरी की कशिश में खो जाते है, अब जरा सोंचिये की जब एक शायर की इबारत इतनी रूहानियत और सुकून भरी होती है तो शायरों से भरे शहर का आलम कैसा होगा.


हम बात कर रहे हैं रायपुर के मोमिनपारा बस्ती की. लगभग 14 हजार की आबादी वाली बस्ती मोमिनपारा शायरों से ही भरी हुई है. या यूँ कहें की मोमिनपर शायरों से ही आबाद है. इस बस्ती का लगभग हर दूसरा निवासी शायरी का हुनर रखता है. 


मोमीनपारा की कहानी:- इस बस्ती के बुर्जुग शायर अकबर अली बताते हैं-लगभग दो सौ साल पहले उत्तर प्रदेश राज्य के फैज़ाबाद और जलालपुर में अकाल पड़ा था तब वहां के जुलाहे ऱोजी-रोटी की तलाश में रायपुर आ गए थे। जुलाहे तंगहाली और मुफलिसी के बावजूद भी दिल के बादशाह थे . वो अपनी मस्ती में मस्त रहते हुए गीत गाते थे, शायरी करते थे. ये जुलाहे कुछ समय बाद यही बस गए.  अकबर अली आगे बताते हैं कि - मोमिन का मतलब होता है- पाक-साफ...यानी जो किसी भी तरह के गुनाह बचा हुआ हो .इस बस्ती के लोग ईमानदारी से गुजर बसर कर एक दूसरे का साथ देते हैं .


शायरों के उस्ताद हैं काविश हैदरी:- मोमिनपारा के जितने भी छोटे-बड़े शायर हैं वे यह मानते हैं कि अपने भाई रजा हैदरी की तरह काविश हैदरी भी शायरों को बेहतर लिखने के लिए प्रेरित करते रहे हैं। उर्दू की बेहतर सेवा के लिए सामाजिक समरसता, चक्रधर, मुस्तफा हुसैन मुश्फिक, हाजी हसन अली सहित अन्य कई सम्मान हासिल करने काविश हैदरी ने रोजी-रोटी कमाने के लिए कुछ अखबारों में नौकरियां भी की, लेकिन अब केवल मुशायरों में ही आना-जाना करते हैं। 


मोमिनपारा के ज्यादातर लोग शायरी क्यों करते हैं पूछे जाने पर काविश बताते हैं कि , 'मोहर्रम के बाद साल भर कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू हो जाता है। लोग कभी करबला की घटना पर लिखने वाले 'मीर अनीस' और 'मिर्जा दबीर' की रचनाओं से वाकिफ होते हैं तो कभी उन्हें देश-दुनिया के मशहूर शायरों को सुनने का मौका मिलता है। पूरी बस्ती का माहौल हमेशा शायराना ही बना रहता है जिस वजह से हर सवाल का जवाब शायरी में ही ढूंढ़ा जाता है।' काविश शायरी को खुदा की नेमत मानते हैं। अपनी एक शायरी के जरिए वे कहते हैं-


किस्मत के लिक्खे को आखिर कैसे कोई मिटाएगा

कोशिश करते-करते इक दिन कागज ही फट जाएगा।

तुझको पागल कहने वाले शायद खुद ही पागल हैं

तेरी बातें कोई न समझा.. कोई समझ ना पाएगा।


मोमिनपरा बस्ती के जिय़ा हैदरी कि उम्र 70 साल हैं, लेकिन उन्हें शायरी करते हुए ही 50 साल हो गए। यानी जब वे 20 साल के थे तब से शायर बन गए हैं। जिय़ा हैदरी स्टेट बैंक से बतौर डिप्टी मैनेजर सेवानिवृत हुए हैं, लेकिन जब वे बैंक की सेवा में थे तब भी धार्मिक rआयोजनों के साथ-साथ महफिल और मुशायरों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे और अब भी उनकी दिनचर्या यही है। उनका मानना है कि शायरी रुह का मसला है। एक शायर सुख-दुख, हंसी-खुशी, राग-विराग सब तरह से दुनिया को देखता है। उसकी दुनिया बहुत बड़ी होती है जिसमें लोगों से ज्य़ादा उनकी फि तरत शामिल होती है। वे फरमाते हैं-

तअ़ल्लुक़ात सही बेतलब नहीं मिलता

किसी से कोई कभी बेसबब नहीं मिलता

जब उसको मेरी जरूरत थी रोज़ मिलता था

मुझे अब उसकी ज़रूरत है अब नहीं मिलता।


भाईचारे की मिसाल है अशफाक अली रहबर:- 48 साल के अशफाक अली रहबर टिन की पेटी बनाते हैं और घर का गुज़ारा चलाने के लिए बच्चों को टयूशन भी पढ़ाते हैं। बेहद तंगी में गुजर-बसर करने के बावजूद अशफाक अपनी जिंदगी से खुश हैं। इस खुश होने की एक सबसे बड़ी वजह उनकी गंगा- जमुनी तहजीब को महत्व देने वाली शायरी है। अशफाक कहते हैं- शायर दोस्त नहीं होते तो मैं शायरी के करीब नहीं जाता और शायरी मेरे साथ नहीं होती तो शायद मैं दुनिया के साथ नहीं होता। अशफाक मानते हैं कि हिंदी और उर्दू दोनों सगी बहनें हैं जिन्हें सियासत चाहकर भी जुदा नहीं कर पाएगी। उनकी एक रचना काबिले-ए- गौर है-

दूर अपने जेहनों से नेफाक को रखिए

इंकलाब आएगा इत्तेफाक तो रखिए

एक और बानगी देखिए

रहबर ये सोचता रहा दरिया के सामने

पानी ने किस तरह मेरी तस्वीर खैंच ली


यहाँ की मिटटी यहाँ के खून में शायरी - नई पीढ़ी के शायरों में इरतिका हैदरी की एक खास पहचान है। वे मरहूम रज़ा हैदरी के छोटे बेटे हैं। एक निजी टेलिफोन कंपनी में कार्यरत इरतिका जब 16 साल के थे तब से राष्ट्रीय स्तर के मुशायरों में शिरकत करने शेर कहने लगे थे । इरतिका कहते हैं- उनके पिता ने ज़मीन -जायदाद नहीं छोड़ी, लेकिन विरासत में हमें कम शब्दों में वजनदार बात कहने का हुनर दे गए हैं। इरतिका मानते हैं कि उनका देश जितना दीगर लोगों के दिलों में धड़कता है उतना ही उनके दिल में धड़कता है। वे फरमाते हैं-

दिल में खौफे खुदा अगर रखिए

फिर ज़माने से कैसा डर रखिए

पार सरहद के ही नहीं दुश्मन

आस्तीनों पे भी नजऱ रखिए


प्रकाशित संग्रह :-यहां के शायरों की इबारत के कई संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जिसमें सिलके गुहर , जज्बातें मुव, जलवए मुव, कैफे मोतबर, साबिरे करबला, जज्बातें रज़ा , ताबिशे मातम, सतरे गुबार, रहीम-कबीर के दोहों का अनुवाद, त्रिवेणी, त्रिवेणी, मजलूम का मातम शामिल है.


एक बार जरूर करें शिरकत :- अगर शेर-ओ-शायरी में आपको भी दिलचस्पी है तो आप एक बार जरूर मोमीनपारा शिरकत करिये आपको यहाँ की हवा में शायरी की खुशबु मिलेगी. और आप तमाम ग़म भूल जायेंगे.