[Kavishala Opinion] दुष्यंत कुमार, दिनकर, हरिशंकर परसाई, मंगलेश डबराल मेरे पसंदीदा लेखकों में है! ऐसे लेखकों को ख़ुशी - गम, राजनीती - समाज कुछ भी हो हमेशा साथ होते है! हर परिस्थिति के लिए रचनाये इनके द्वारा लिखी गयी है!
मंगलेश डबराल केवल एक लेखक नहीं बल्कि भारतीय साहित्य और समाज के लिए पूरी किताब थे, साहित्य को ईमानदार साहित्यकार बहुत कम मिलते है, मंगलेश डबराल शायद आधुनिक साहित्य में आखिरी ईमानदार लेखक थे! युवा साहित्यकारो को उनसे साहित्य के साथ साथ यह भी सीखना चाहिए कलम की ताकत होते हुए ईमानदार कैसे रहते है, लेखनी को ईमानदारी कैसे सिखाते है!
एक ऐसा लेखक जो कठिन से कठिन बात साधारण शब्दों में बयान कर देता था!
"सरल होना साधारण होना नहीं है!"
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यथार्थ इन दिनों बहुत ज़्यादा यथार्थ है
उसे समझना कठिन है सहन करना और भी कठिन।
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मैंने शहर को देखा और मैं मुस्कराया
वहाँ कोई कैसे रह सकता है
यह जानने मैं गया
और वापस न आया
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एकाएक आसमान में
एक तारा दिखाई देता है
हम दोनों साथ-साथ जा रहे हैं
अंधेरे में वह तारा और मैं।
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कुछ शब्द चीख़ते हैं
कुछ कपड़े उतार कर
घुस जाते हैं इतिहास में
कुछ हो जाते हैं ख़ामोश
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जब रोशनी हुई
परछाई दिखी
अपने से बड़ा दिखा
अपना अंधकार!
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'मैं देखता हूं तुम्हारे भीतर पानी सूख रहा है
तुम्हारे भीतर हवा ख़त्म हो रही है
और तुम्हारे समय पर कोई और क़ब्ज़ा कर रहा है.
इत्यादि
किसान से लेकर जवान की चिंता, और उसकी समस्याओ के कविता के माध्यम से बयान करना रामधारी सिंह 'दिनकर' और दुष्यंत कुमार के बाद कोई कर पाया है तो वह मंगलेश डबराल हैं! साहित्य अकादमी मिलना एक साधारण बात है उनकी रचनायें पहाड़ पर लालटेन, घर का रास्ता और लेखक की रोटी समाज के लिए आइना हैं, एक ऐसा आइना जो रोजाना उठने से लेकर सोने तक का प्रतिबिम्ब हैं! लेखनी की ईमानदारी और ताकत की बात करें तो आपको समझ आएगा की मंगलेश उसकी परिभाषा थी! उन्होंने गुजरात हिंसा के बाद २००२ में लिखा 'गुजरात के एक मृतक का बयान':
'मेरे जीवित होने का कोई बड़ा मक़़सद नहीं था
और मुझे मारा गया इस तरह जैसे मुझे मारना कोई बड़ा मक़़सद हो
और जब मुझसे पूछा गया तुम कौन हो?
क्या छिपाए हुए हो अपने भीतर एक दुश्मन का नाम
कोई मज़़हब कोई तावीज़
मै कुछ कह नहीं पाया मेरे भीतर कुछ नहीं था
सिर्फ़ एक रंगरेज एक मिस्त्री एक कारीगर एक कलाकार एक मजूर था
जब मैं अपने भीतर मरम्मत कर रहा था किसी टूटी हुई चीज़़ की
जब मेरे भीतर दौड़ रहे थे एल्युमीनियम के तारों की
साइकिल के
नन्हे पहिये
तभी मुझ पर गिरी एक आग बरसे पत्थर
और जब मैंने आख़िरी इबादत में अपने हाथ फैलाये
तब तक मुझे पता नहीं था बन्दगी का कोई जवाब नहीं आता.'

हिंदी कविता और साहित्य को मंगलेश डबराल ने क्या क्या दिया है यह शब्दों में बयां कर पाना संभव नहीं है! उनको हम राजनीतिक कवि कह सकते हैं, सांस्कृतिक, पारिवारिक, प्रेमिल और मानवीय कवि कह सकते हैं! गद्यकार, उनके यात्रा संस्मरण एक अलग अंदाज में पढ़े जाते है! 'एक सड़क एक जगह' को पढ़ना शहरों को, देशों को, दुनिया को एक नई आंख से देखना है! लेकिन वह हमेशा से बाज़ार, पूंजीवाद और सांप्रदायिकता के खिलाफ पहली लाइन में खड़े थे!
संपादक और अनुवादक के रूप में मंगलेश डबराल को कौन नहीं जानता, इसके बिना उनका परिचय हमेशा अधूरा रहेगा! दुनिया के कई बड़े कवियों की कविताओं का उन्होंने बिल्कुल मर्म पकड़ने वाला अनुवाद किया. कुछ साल पहले अरुंधती राय के दूसरे उपन्यास 'मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैप्पीनेस' का उनका अनुवाद भी खूब सराहा गया. वे संवादरत रहते थे और अपने बाद की पीढ़ी के लेखकों-कवियों से उनका संवाद संभवतः दूसरे लेखकों-कवियों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा था. बेशक, उनमें कमज़ोरियां थीं जो हम सबमें होंगी, लेकिन अपने सर्वोत्तम क्षणों में उन जैसी मानवीय आभा वाला मनुष्य मिलना मुश्किल था.
मंगलेश डबराल: मंगलेश डबराल (16 मई 1948 - 09 दिसम्बर 2020) समकालीन हिन्दी कवियों में सबसे चर्चित नाम हैं। इनका जन्म १६ मई १९४८ को टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड के काफलपानी गाँव में हुआ था, इनकी शिक्षा-दीक्षा देहरादून में हुई। दिल्ली आकर हिन्दी पैट्रियट, प्रतिपक्ष और आसपास में काम करने के बाद वे भोपाल में मध्यप्रदेश कला परिषद्, भारत भवन से प्रकाशित साहित्यिक त्रैमासिक पूर्वाग्रह में सहायक संपादक रहे। इलाहाबाद और लखनऊ से प्रकाशित अमृत प्रभात में भी कुछ दिन नौकरी की। सन् १९८३ में जनसत्ता में साहित्य संपादक का पद सँभाला। कुछ समय सहारा समय में संपादन कार्य करने के बाद वह नेशनल बुक ट्रस्ट से जुड़े रहे।
कोरोना से संक्रमित होने के कारण 9 दिसम्बर 2020 को वसुंधरा, गाजियाबाद के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया।
मंगलेश डबराल के पाँच काव्य संग्रह प्रकाशित हैं- पहाड़ पर लालटेन, घर का रास्ता, हम जो देखते हैं, आवाज भी एक जगह है और नये युग में शत्रु। इसके अतिरिक्त इनके दो गद्य संग्रह लेखक की रोटी और कवि का अकेलापन के साथ ही एक यात्रावृत्त एक बार आयोवा भी प्रकाशित हो चुके हैं।
दिल्ली हिन्दी अकादमी के साहित्यकार सम्मान, कुमार विकल स्मृति पुरस्कार और अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना हम जो देखते हैं के लिए साहित्य अकादमी द्वारा सन् २००० में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित मंगलेश डबराल की ख्याति अनुवादक के रूप में भी है। मंगलेश की कविताओं के भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेज़ी, रूसी, जर्मन, डच, स्पेनिश, पुर्तगाली, इतालवी, फ़्राँसीसी, पोलिश और बुल्गारियाई भाषाओं में भी अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। कविता के अतिरिक्त वे साहित्य, सिनेमा, संचार माध्यम और संस्कृति के विषयों पर नियमित लेखन भी करते हैं। मंगलेश की कविताओं में सामंती बोध एवं पूँजीवादी छल-छद्म दोनों का प्रतिकार है। वे यह प्रतिकार किसी शोर-शराबे के साथ नहीं अपितु प्रतिपक्ष में एक सुन्दर स्वप्न रचकर करते हैं। उनका सौंदर्यबोध सूक्ष्म है और भाषा पारदर्शी। (विकिपीडिया)
इस साल कोरोना ने कई दुख दिए हैं, कई तरह से व्यक्ति और समाज के रूप में हमें तार-तार कर गया, लेकिन २०२० ने जाते हुए हमें एक भारी घाव दिया है, ऐसा जख्म जो कभी नहीं जायेगा!

