फिर पिता की याद आई है मुझे - कुमार विश्वास
फिर पुराने नीम के नीचे खड़ा हूं
फिर पिता की याद आई है मुझे
नीम सी यादें ह्रदय में चुप समेटे
चारपाई डाल आंगन बीच लेटे
सोचते हैं हित सदा उनके घरों का
दूर है जो एक बेटी चार बेटे
फिर कोई रख हाथ कांधे पर
कहीं यह पूछता है-
"क्यूं अकेला हूं भरी इस भीड़ में"
मैं रो पड़ा हूं
फिर पिता की याद आई है मुझे
फिर पुराने नीम के नीचे खड़ा हूं
दिवंगत पिता के प्रति: सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
सूरज के साथ-साथ
सन्ध्या के मंत्र डूब जाते थे,
घंटी बजती थी अनाथ आश्रम में
भूखे भटकते बच्चों के लौट आने की,
दूर-दूर तक फैले खेतों पर,
धुएँ में लिपटे गाँव पर,
वर्षा से भीगी कच्ची डगर पर,
जाने कैसा रहस्य भरा करुण अन्धकार फैल जाता था,
और ऐसे में आवाज़ आती थी पिता
तुम्हारे पुकारने की,
मेरा नाम उस अंधियारे में
बज उठता था, तुम्हारे स्वरों में।
मैं अब भी हूँ
अब भी है यह रोता हुआ अन्धकार चारों ओर
लेकिन कहाँ है तुम्हारी आवाज़
जो मेरा नाम भरकर
इसे अविकल स्वरों में बजा दे।
'धक्का देकर किसी को
आगे जाना पाप है'
अत: तुम भीड़ से अलग हो गए।
'महत्वाकांक्षा ही सब दुखों का मूल है'
इसलिए तुम जहाँ थे वहीं बैठ गए।
'संतोष परम धन है'
मानकर तुमने सब कुछ लुट जाने दिया।
पिता! इन मूल्यों ने तो तुम्हें
अनाथ, निराश्रित और विपन्न ही बनाया,
तुमसे नहीं, मुझसे कहती है,
मृत्यु के समय तुम्हारे
निस्तेज मुख पर पड़ती यह क्रूर दारूण छाया।
'सादगी से रहूँगा'
तुमने सोचा था
अत: हर उत्सव में तुम द्वार पर खड़े रहे।
'झूठ नहीं बोलूँगा'
तुमने व्रत लिया था
अत:हर गोष्ठी में तुम चित्र से जड़े रहे।
तुमने जितना ही अपने को अर्थ दिया
दूसरों ने उतना ही तुम्हें अर्थहीन समझा।
कैसी विडम्बना है कि
झूठ के इस मेले में
सच्चे थे तुम
अत:वैरागी से पड़े रहे।
तुम्हारी अन्तिम यात्रा में
वे नहीं आए
जो तुम्हारी सेवाओं की सीढ़ियाँ लगाकर
शहर की ऊँची इमारतों में बैठ ग थे,
जिन्होंने तुम्हारी सादगी के सिक्कों से
भरे बाजार भड़कीली दुकानें खोल रक्खी थीं;
जो तुम्हारे सदाचार को
अपने फर्म का इश्तहार बनाकर
डुगडुगी के साथ शहर में बाँट रहे थे।
पिता! तुम्हारी अन्तिम यात्रा में वे नहीं आए
वे नहीं आए
एहसानमन्द हूँ पिता: सविता सिंह
एहसानमन्द हूँ पिता
कि पढ़ाया-लिखाया मुझे इतना
बना दिया किसी लायक कि जी सकूँ निर्भय इस संसार में
झोंका नहीं जीवन की आग में जबरन
बांधा नहीं किसी की रस्सी से कि उसके पास ताकत और पैसा था
लड़ने के लिए जाने दिया मुझको
घनघोर बारिश और तूफ़ान में
एहसानमन्द हूँ कि इन्तज़ार नहीं किया
मेरे जीतने और लौटने का
मसरूफ़ रहे अपने दूसरे कामों में
किससे पूछूँ, पापा!: दीनदयाल शर्मा
पापा! मुझे बताओ बात
कैसे बनते हैं दिन-रात,
चंदा तारे दिखें रात को
सुबह चले जाते चुपचाप।
पापा! पेड़ नहीं चलते हैं
ना ही करते कोई बात
कैसे कट जाते हैं, पापा!
इनके दिन और इनकी रात।
और ढेर-सी बातें मुझको
समझ क्यूँ नहीं आती हैं,
ना घर में बतलाता कोई
ना मैडम बतलाती हैं।
फिर मैं किससे पूछूँ, पापा!
मुझको बतलाएगा कौन
डाँट-डपट के कर देते हैं
मुझको, पापा! सारे मौन।
पिता के बाद: रमेश प्रजापति
कुछ दिन
छत पर उतरे परिनदे
गिलहारी की उदास पनियाली आँखें
डबडबाती रही घर के सूनेपन में
पेड़ से टपके गूलर
सूखते रहे आँगन में
माँ की सूनी कलाइयों में
खनकता रहा चूड़ियों का खालीपन
पिता के बाद
छोटी बेटी की वीरान आँखें ढूँढती रही
कँधों का झूला
चाक से उतरकर आँगन में चहकती रही
खिलौनों की खिलखिलाहट
खाट के पास खड़ा हुक्का
त्रसता
पिता के बाद
मुँडेर पर बैठी गौरैयाँ
पुकारती रही पिता को
आँगन में टहलती रही
पिता की चिंतामग्न चहलकदमी
पृथ्वी-सा टिका चाक
अपनी घुरी पर
एकटक निहारता रहा मुँह लटकाए
ध्रुव तारे को
चितकबरी गाय
अपने नथुनों से सूंघती रही सानी में
पिता की उँगलियों का स्पर्श
पिता के बाद
लचीला हो गया घर का कायदा-कानून
कपूर-से उड़े मेरे बेवक्त
घर लौटने के डर के बावजूद
दौड़ता है मेरी रगों में
पिता के उसूलों का रक्त
जो बचाए रखता है आज भी
मेरे अंदर पिता का होना।
धूप बहुत है - राहत इन्दौरी
धूप बहुत है मौसम जल थल भेजो ना
सिर्फ़ सच और झूठ की मीज़ान में रक्खे रहे
सर पर सात आकाश ज़मीं पर सात समुंदर बिखरे हैं
हंसते रहते हैं मुसलसल हम-तुम
हौसले ज़िंदगी के देखते हैं
हमें दिन-रात मरना चाहिए था
दाव पर मैं भी, दाव पर तू भी है
कौन दरियाओं का हिसाब रखे
मेरे मरने की ख़बर है उसको
सर पर बोझ अँधियारों का है मौला ख़ैर
हमें अब इश्क़ का चाला पड़ा है
पुराने शहर के मंज़र निकलने लगते हैं
अपने दीवार-ओ-दर से पूछते हैं
हमने ख़ुद अपनी रहनुमाई की
शजर हैं अब समर आसार मेरे
इधर की शय उधर कर दी गई है
पाँव से आसमान लिपटा है
सफ़र में जब भी इरादे जवान मिलते हैं
ऊँचे-ऊँचे दरबारों से क्या लेना
काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं
किसने दस्तक दी है दिल पर कौन है
शराब छोड़ दी तुमने कमाल है ठाकुर
मोहब्बतों के सफ़र पर निकल के देखूँगा
जितना देख आये हैं अच्छा है यही काफ़ी है
सब को रुस्वा बारी बारी किया करो
मौत की तफ़सील होनी चाहिये
दिये जलाये तो अंजाम क्या हुआ मेरा
सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए
धर्म बूढ़े हो गए मज़हब पुराने हो गए
मेरी तेज़ी, मेरी रफ़्तार हो जा
उसे अब के वफ़ाओं से गुज़र जाने की जल्दी थी
तेरे वादे की तेरे प्यार की मोहताज नहीं
ऊँघती रहगुज़र के बारे में
दरबदर जो थे वह दीवारों के मालिक हो गये
दो गज़ टुकड़ा उजले-उजले बादल का
दुआओं में वह तुम्हें याद करने वाला है
सबब वह पूछ रहे हैं उदास होने का
अँधेरे चारों तरफ़ सांय-सांय करने लगे
अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है
रात की धड़कन जब तक जारी रहती है
बैर दुनिया से क़बीले से लड़ाई लेते
तो क्या बारिश भी ज़हरीली हुई है
चराग़ों को उछाला जा रहा है
ये सर्द रातें भी बन कर अभी धुआँ उड़ जाएँ
खुश्क दरियाओं में हल्की सी रवानी और है
हर मुसाफ़िर है सहारे तेरे
ये हर सू जो फ़लक-मंज़र खड़े हैं
अब अपनी रूह के छालों का कुछ हिसाब करूँ
ज़िन्दगी उम्र से बड़ी तो नहीं
हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते
मुझे डुबो के बहुत शर्मसार रहती है
सवाल घर नहीं बुनियाद पर उठाया है
नाम लिक्खा था आज किस-किस का
जितने अपने थे, सब पराए थे
उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो
पहली शर्त जुदाई है
दरमियां एक ज़माना रक्खा जाए
मौसम की मनमानी है
नींदें क्या-क्या ख़्वाब दिखाकर ग़ायब हैं
शाम से पहले शाम कर दी है
पुराने दाँव पर हर दिन नए आँसू लगाता है
बढ़ गई है कि घट गई दुनिया
नदी ने धूप से क्या कह दिया रवानी में
शाम होती है तो पलकों पे सजाता है मुझे
रात बहुत तारीक नहीं है
मुझमें कितने राज़ हैं बतलाऊँ क्या
उठी निगाह तो अपने ही रू-ब-रू हम थे
मसअला प्यास का यूं हल हो जाए
वो कभी शहर से गुज़रे तो ज़रा पूछेंगे
नज़ारा देखिये कलियों के फूल होने का
अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए
मौसम बुलाएंगे तो सदा कैसे आएगी
यहाँ कब थी जहाँ ले आई दुनिया
ज़िंदगी की हर कहानी बे-असर हो जाएगी
बरछी ले कर चांद निकलने वाला है
तेरा मेरा नाम ख़बर में रहता था
इक नया मौसम नया मंज़र खुला
मौसमों का ख़याल रक्खा करो
मुआफ़िक़ जो फ़िज़ा तैयार की है
चराग़ों का घराना चल रहा है
तूफ़ां तो इस शहर में अक्सर आता है
ख़ाक से बढ़कर कोई दौलत नहीं होती
ज़मीं बालिश्त भर होगी हमारी
ये आईना फ़साना हो चुका है

