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गोपाल दास नीरज | अपने संघर्षों में भी प्रयोग करते रहे...

[Kavishala Daily]

गोपाल दास नीरज, एक ऐसा लोकप्रिय गीतकार जो उर्दू का कवि और हिंदी का शायर था!


एक दिन मगर यहां,

ऐसी कुछ हवा चली,

लुट गयी कली कली कि घुट गयी गली गली,

और हम लुटे लुटे,

वक्त से पिटे पिटे,

सांस की शराब का खुमार देखते रहे.

कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे


यह शानदार और बहुचर्चित पंक्तियां रचने वाला शब्द शिल्पी जुलाई 2018 में इस जहान-ए-फ़ानी से कूच कर गया, लेकिन उसके रचे तमाम गीतों का कारवां मुसलसल सफर पर है और दिलों में बच गया है यादों का गुबार. हम बात कर रहे हैं कवि, गीतकार, अध्यापक और कलामंचों की जान रह चुके गोपाल दास ‘नीरज’ की. यूपी के इटावा में जन्मा यह बहुमुखी प्रतिभा का धनी कवि, फिल्मी गीतों, हिंदी के साहित्यिक गीतों, कविताओं और मंचीय कविता पाठ को एक नया आयाम दे गया.


अब के सावन में शरारत मेरे साथ हुई

मेरा घर छोड़ के सारे शहर में बरसात हुई

जिंदगी भर औरों से हुई गुफ़्तगू मगर

आज तक हमारी हमसे न मुलाक़ात हुई


जब ‘नीरज’ 6 साल के हुए तो सर से बाप का साया उठ गया. गरीबी बहुत थी. घर चलाना मुश्किल था. कहते हैं पापी पेट कुछ भी कराता है. ऐसा ही कुछ गोपाल दास के भी साथ हुआ. उनके गांव पुरावली से यमुना नदी महज कुछ किलोमीटर दूर थी. वे नदी में तैरकर सिक्के निकालने लगे. इसके अलावा पान-बीड़ी भी बेची. रिक्शा चलाया. 10 साल वे दूसरों के घर में रहे. अकेलापन काटने लगा. फिर उन्होंने कुछ दिन एक वकील के यहां टाइपिस्ट का भी काम किया. क्लर्क बने. फिर प्राध्यापक भी बन गए. यही नहीं 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कुछ दिनों के लिए जेल भी गए.


संघर्ष ये तुमने दिखला दिया कि पौरुष के आगे,

मुश्किल को अपनी ही मुश्किल पड़ जाती है,

हिम्मत गर अपनी हारे नहीं मुसाफिर तो,

मंजिल खुद उसको बढ़ कर गले लगाती है.

ये बात 1954 की है. दुलहन के श्रृंगार में तैयार उनकी भांजी की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो जाती है. यह हादसा उनके अंतर मन को झकझोर देता है. यहां से उनके अंदर एक कालजयी लेखक का सृजन होता है. वे अपने गम को कागज के पन्नों पर उतारते हैं और लिख डालते हैं वो गीत, जो इतिहास रच देता है.


पालकी लिए हुए कहार देखते रहे.

कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे.

इस गीत को उन्होंने पहली बार लखनऊ रेडियो में पढ़ा था. बाद में इसको आवाज दी मोहम्मद रफी ने. मशहूर गीतकार जावेद अख्तर इस गीत के बाद इतने प्रभावित हुए कि वे उन्हें उर्दू का कवि और हिंदी का शायर बुलाने लगे.


गोपाल दास बचपन में जब अपने तंगी के दिनों को गुजार रहे थे. वे एकांतवास में चले गए थे. एक तरफ तो वे जीवन के कड़े अनुभवों से गुजर रहे थे, वहीं दूसरी ओर जीवन के संघर्षों का मर्म समझाने वाले महानुभवों की कृतियों को भी आत्मसात कर रहे थे. कबीर, ओशो, महर्षि अरविंद, मुक्तानंद आदि को पढ़ने लगे. समझने लगे. उनके मष्तिसक पर इसका प्रभाव किस कदर पड़ा. उसकी एक बानगी पढ़िए.


हे गणपति निज भक्त को, दो ऐसी निज भक्ति,

काव्य सृजन में ही रहे, जीवन-भर अनुरक्ति.

मातु शारदे दो हमें, ऐसा कुछ वरदान,

जो भी गाऊं गीत मैं, बन जाये युग-गान.

हमने इक परिवार ही, माना सब संसार,

सदा सदा से हम रहे, सभी द्वैत के पार.


इतना ही नहीं. एक और..


अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए.

जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए.


जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर

फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए.


आग बहती है यहां गंगा में झेलम में भी

कोई बतलाए कहां जाके नहाया जाए.


प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए

हर अंधेरे को उजाले में बुलाया जाए.


हरिवंश राय बच्चन का प्रभाव

ये हरिवंश राय बच्चन की कविताओं का आकर्षण था जो 1925 में जन्मे गोपाल दास को इस विधा की तरफ खींच लाया. 1947 यानी देश की आजादी का साल और इसी साल ‘बच्चन’ और ‘नीरज’ के मिलन का भी साल था. पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर अवध प्रांत तक हरिवंश राय की कविताएं मुशायरों की शान बढ़ा रही थी. उस

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