सब को मालूम है ‘सीमा’ की हक़ीक़त लेकिन,

दिल के ख़ुश रखने को, ‘शाह-यद’ ये ख़्याल अच्छा है।


ये शेर राहुल गाँधी ने आठ जून को ट्विटर पर अमित शाह पर तंज कसते हुए ट्वीट किया था. राहुल गाँधी के इस ट्वीट के बाद राजनाथ सिंह व शशि थरूर जैसे दिग्गज राजनेता शायराना अंदाज में एक दूसरे पर तंज कसते हुए नजर आये. फ़िलहाल शेर-ओर-शायरी के जरिये एक दूसरे का विरोध और समर्थन करने का यह सिलसिला ट्विटर पर अभी भी जारी है.


कहतें हैं कि शायरी अदब कि जुबान होती है. भले ही एक दूसरे के प्रति गुस्सा, रोष या असहमति हो, शायरी इस असहमति को जाहिर करने का सबसे शालीन, संयत और सभ्य तरीका है.


आज के समय में जब हर छोटी बड़ी बात को बढ़ा चढ़ा कर आक्रोशित ढंग से पेश किया जा रहा है, जब राजनीति के गलियारे में नफरती बोल और शब्दों की सीमा का ख्याल नही किया जा रहा है. ऐसे समय में राजनेताओं द्वारा शेर के माध्यम से एक दूसरे के प्रति असहमति जाहिर करना सुकून भरा है.

अगर राजनीति में इसी अदब के साथ, भाषा की गरिमा का ख्याल रखते हुए एक दूसरे से असहमति जाहिर की जाये तो यक़ीनन न सिर्फ देश कि राजनीति शिष्ट होगी बल्कि देश में व्याप्त नफरती उन्माद भी ख़त्म हो जाएगा.


राहुल गाँधी ने ग़ालिब की शायरी में थोड़ा बदलाव करते हुए ट्वीट किया था. और अपने ट्वीट के माध्यम से अमित शाह पर तंज किया किया था. राहुल गाँधी ने ग़ालिब के इस शेर में बदलाव करते हुए किया था ट्वीट -

मिर्जा ग़ालिब का एक मशहूर शेर है - 


"हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन 

दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है"

 

ग़ालिब के इसी शेर को राहुल गांधी ने कुछ इस तरह से इस्तेमाल किया था- 


 सब को मालूम है ‘सीमा’ की हक़ीक़त लेकिन,

दिल के ख़ुश रखने को, ‘शाह-यद’ ये ख़्याल अच्छा है।


राहुल गाँधी के ट्वीट का जवाब देते हुए राजनाथ सिंह ने ट्वीट किया कि - 

मिर्ज़ा ग़ालिब का ही शेर थोड़ा अलग अन्दाज़ में है। ‘


‘हाथ’ में दर्द हो तो दवा कीजै,

‘हाथ’ ही जब दर्द हो तो क्या कीजै..


फ़िलहाल जिस शेर पर बदलाव करके राजनाथ सिंह ने राहुल गांधी पर निशाना साधा था वो ग़ालिब का शेर नहीं था बल्कि वो शेर मंज़र लखनवी का था. मंजर लखनवी के इस मशहूर शेर को बदल कर राजनाथ सिंह ने साधा था राहुल पर निशाना.  


दर्द हो दिल में तो दवा कीजे

और जो दिल ही न हो तो क्या कीजे


राहुल गाँधी और राजनाथ सिंह के बाद शशि थरूर ने भी एक बाद एक कई शेर के माध्यम से तंग कसा. शशि थरूर ने लिखा -

हे नाथ ! आप क्यों घबराए हैं ?

क्या सीमा विवाद नहीं सुलझ पाए हैं?

पूछते हैं गालिब, बता दीजै

क्या चीनी लद्दाख में घुस आए हैं?


असहमति ही लोकतंत्र कि खूबसूरती है. और जब असहमति संयत और अदब के साथ जाहिर कि जाये तो उसकी बात ही अलग है. अगर देश के राजनेता अपनी असहमति को जाहिर करने के लिए ऐसे ही अदब के रस्ते अख्तियार करें, तो यक़ीनन देश में लोकतंत्र कि खूबसूरती भी बढ़ेगी और एक दूसरे के दिलों में नफरत भी नहीं जन्मेगी.