ज़िंदगी फूस की झोंपड़ी है रेत की नींव पर जो खड़ी है पल दो पल है जगत का तमाशा जैसे आकाश में फुलझ़ड़ी है कोई तो राम आए कहीं से बन के पत्थर अहल्या खड़ी है सिर छुपाने का बस है ठिकाना वो महल है कि या झोंपड़ी है धूप निकलेगी सुख की सुनहरी दुख का बादल घड़ी दो घड़ी है यों छलकती है विधवा की आँखें मानो सावन की कोई झ़ड़ी है हाथ बेटी के हों कैसे पीले झोंपड़ी तक तो गिरवी पड़ी है जिसको कहती है ये दुनिया शादी दर असल सोने की हथकड़ी है देश की दुर्दशा कौन सोचे आजकल सबको अपनी पड़ी है मुँह से उनके है अमृत टपकता किंतु विष से भरी खोपड़ी है विश्व के 'हंस' कवियों से पूछो दर्द की उम्र कितनी बड़ी है 4. बैठे हों जब वो पास, ख़ुदा ख़ैर करे बैठे हों जब वो पास, ख़ुदा ख़ैर करे फिर भी हो दिल उदास, ख़ुदा ख़ैर करे मैं दुश्मनों से बच तो गया हूँ, लेकिन हैं दोस्त आस-पास, ख़ुदा ख़ैर करे नारी का तन उघाड़ने की होड़ लगी यदि है यही विकास, ख़ुदा ख़ैर करे अब देश की जड़ खोदनेवाले नेता खुद लिखेंगे इतिहास, ख़ुदा ख़ैर करे मंदिर मठों में बैठ के भी संन्यासी उमेटन लगे कपास, ख़ुदा ख़ैर करे मावस की रात उन की छत पर देखो तो पूनम का है उजास, ख़ुदा ख़ैर करे दिन-रात 'हंस' रहते हुए पानी में मछली को लगे प्यास, ख़ुदा ख़ैर करे