
ज़माना अब ये कैसा आ रहा है
कि हर बदमस्त सँभला जा रहा है
जलाती है ख़िरद शम्ओं पे शमएँ
अंधेरा है कि बढ़ता जा रहा है
दुआएँ कर रहे हैं अहल-ए-साहिल
सफ़ीना है कि डूबा जा रहा है
मगर बढ़ती नहीं है बात आगे
ज़माना है कि ग़ुजरा जा रहा है
भरा था रंग जिस ख़ाके में बरसों
वो ख़ाका यक-ब-यक धुँदला रहा है
मोह
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