यूँ माना ज़ि‍न्दगी है चार दिन की बहुत होते हैं यारो चार दिन भी ख़ुदा को पा गया वायज़ मगर है ज़रूरत आदमी को आदमी की बसा-औक्रात1 दिल से कह गयी है बहुत कुछ वो निगाहे-मुख़्तसर भी मिला हूँ मुस्कुरा कर उससे हर बार मगर आँखों में भी थी कुछ नमी-सी महब्बत में करें क्या हाल दिल का ख़ुशी ही काम आती है न ग़म की भरी महफ़ि‍ल में हर इक से बचा कर तेरी आँखों ने मुझसे बात कर ली लड़कपन की अदा है जानलेवा गज़ब ये छोकरी है हाथ-भर की है कितनी शोख़, तेज़ अय्यामे-गुल2 पर चमन में मुस्कुहराहट कर कली की रक़ीबे-ग़मज़दा3 अब सब्र कर ले कभी इससे मेरी भी दोस्ती थी