ये किन रस्तों पे मैं निकल गया हूँ खुद में कितना मैं सिमट गया हूँ। अपनी ही सुध बुध रही न मुझको न जाने किसके मैं निकट गया हूँ। घर से इस दूरी ने बहुत सताया अम्मा से फिर मैं लिपट गया हूँ। मुझ पत्थर को तूने छुआ ऐसे बर्फ़ की माफ़िक मैं पिघल गया हूँ। मेरी आहों से ज़रा बच के रहना कुछ शोलों को मैं निगल गया हूँ। चंद रुपए पैसे क्या जोड़े मैंने कतरा कतरा मैं बिखर गया हूँ। जिससे बचने को इतना भटका मैंने पाया उसको जिधर गया हूँ।