ये और बात कि इस अहद की नज़र में हूँ

अभी मैं क्या कि अभी मंज़िल-ए-सफ़र में हूँ

अभी नज़र नहीं ऐसी कि दूर तक देखूँ

अभी ख़बर नहीं मुझ को कि किस असर में हूँ

पिघल रहे हैं जहाँ लोग शो'ला-ए-जाँ से

शरीक मैं भी इसी महफ़िल-ए-हुनर में हूँ

जो चाहे सज्दा गुज़ारे जो चाहे ठुकरा दे

पड़ा हुआ मैं ज़माने की रहगुज़र में हूँ

जो साया हो तो डरूँ और धूप हो तो जलूँ

कि एक नख़्ल-ए-नुमू ख़ाक-ए-नौहा-गर में हूँ

किरन किरन कभी ख़ुर्शीद बन के निकलूँगा

अभी चराग़ की सूरत में अपने घर में हूँ

बिछड़ गई है वो ख़ुश्बू उजड़ गया है वो रंग

बस अब तो ख़्वाब सा कुछ अपनी चश्म-ए-तर में हूँ