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यह दिया बुझे नहीं - गोपाल सिंह नेपाली

घोर अंधकार हो, चल रही बयार हो, आज द्वार–द्वार पर यह दिया बुझे नहीं यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है । शक्ति का दिया हुआ, शक्ति को दिया हुआ, भक्ति से दिया हुआ, यह स्वतंत्रता–दिया, रूक रही न नाव हो जोर का बहाव हो, आज गंग–धार पर यह दिया बुझे नहीं, यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है । यह अतीत कल्पना, यह विनीत प्रार्थना, यह पुनीत भावना, यह अनंत साधना, शांति हो, अशांति हो, युद्ध¸ संधि¸ क्रांति हो,
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