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वो रात बे-पनाह थी और मैं ग़रीब था - उबैदुल्लाह अलीम

वो रात बे-पनाह थी और मैं ग़रीब था

वो जिस ने ये चराग़ जलाया अजीब था

वो रौशनी कि आँख उठाई नहीं गई

कल मुझ से मेरा चाँद बहुत ही क़रीब था

देखा मुझे तो तब्अ रवाँ हो गई मिरी

वो मुस्कुरा दिया तो मैं शायर अदीब था

रखता क्यूँ मैं रूह बदन उस के सामने

वो यूँ भी था तबीब वो यूँ भी तबीब था

हर सिलसिला था उस का ख़ुदा से मिला हुआ

चुप हो कि लब-कुशा

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