
कभी चलना सिखाया,
संभल न सका में जब
गिरकर संभालना सिखाया
सहारे के लिए वो अंगुलिया
किसी सीढ़ी से काम नहीं
आदत नही ज़रूरत थी वो अंगुलियां
लिखना सिखाया, खेलना सिखाया
धीरे धीरे मुट्ठी में रहने लगी थी वो अंगुलियां
शब्द गहरे होने लगे, अर्थ बढ़े होने लगे
याद रहीं तो सिर्फ वो अंगुलियां
जो कभी अखबारों के पन्ने पलटती नज़र आती
क
Read More! Earn More! Learn More!
