कभी चलना सिखाया,
संभल न सका में जब
गिरकर संभालना सिखाया
सहारे के लिए वो अंगुलिया
किसी सीढ़ी से काम नहीं
आदत नही ज़रूरत थी वो अंगुलियां
लिखना सिखाया, खेलना सिखाया
धीरे धीरे मुट्ठी में रहने लगी थी वो अंगुलियां
शब्द गहरे होने लगे, अर्थ बढ़े होने लगे
याद रहीं तो सिर्फ वो अंगुलियां
जो कभी अखबारों के पन्ने पलटती नज़र आती
कभी किताबो के बीच उलझी दिख जाती
कलम से जूझती कभी कभी,
तो कभी पन्नो की उलझन सुलझाती
एक दिन जड़ सी हो गयी थी वो अंगुलियां
कोशिश भी की लेकिन बदल सी गयी थी
जैसे मुझे जानती न हो, ऐसा कैसे हुआ
याद दिलाना मेरे बस में न था, ये कैसे हुआ
पसोपेश गहरी बहुत, लेकिन उन शब्दो से कम
उनके अर्थ आज और गहरे हो चले जब न रहीं वो अंगुलियां