वेणु लो, गूँजे धरा - माखनलाल चतुर्वेदी's image
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वेणु लो, गूँजे धरा - माखनलाल चतुर्वेदी

वेणु लो, गूँजे धरा मेरे सलोने श्याम एशिया की गोपियों ने वेणि बाँधी है गूँजते हों गान,गिरते हों अमित अभिमान तारकों-सी नृत्य ने बारात साधी है। युग-धरा से दृग-धरा तक खींच मधुर लकीर उठ पड़े हैं चरण कितने लाड़ले छुम से आज अणु ने प्रलय की टीका विश्व-शिशु करता रहा प्रण-वाद जब तुमसे। शील से लग पंचशील बना, लगी फिर होड़ विकल आगी पर तृणों के मोल की बकवास भट्टियाँ हैं, हम शान्ति-रक्षक हैं क्यों विकास करे भड़कता विश्व सत्यानाश ! वेद की-सी वाणियों-सी निम्नगा की दौड़ ऋषि-गुहा-संकल्प से ऊँचे उठे नगराज घूमती धरती, सिसकती प्राण वाली साँस श्याम तुमको खोजती, बोली विवश वह आज। आज बल से, मधुर बलि की, यों छिड़े फिर होड़ जगत में उभरें अमित निर्माण, फिर निर्माण, श्वास के पंखे झलें, ले एक और हिलोर जहाँ व्रजवासिनि पुकारें वहाँ भेज त्राण। हैं तुम्हारे साथ वंशी के उठे से वंश और अपमानित उठा रक्खे अधर पर गान! रस बरस उट्ठा रसा से कसमसाहट ले खुल गये हैं कान आ
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