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वर्षा ने आज विदाई ली- माखनलाल चतुर्वेदी

वर्षा ने आज विदाई ली जाड़े ने कुछ अंगड़ाई ली प्रकृति ने पावस बूँदो से रक्षण की नव भरपाई ली। सूरज की किरणों के पथ से काले काले आवरण हटे डूबे टीले महकन उठ्ठी दिन की रातों के चरण हटे। पहले उदार थी गगन वृष्टि अब तो उदार हो उठे खेत यह ऊग ऊग आई बहार वह लहराने लग गई रेत। ऊपर से नीचे गिरने के दिन रात गए छवियाँ छायीं नीचे से ऊपर उठने की हरियाली पुन: लौट आई। अब पुन: बाँसुरी बजा उठे ब्रज के यमुना वाले कछार धुल गए किनारे नदियों के धुल गए गगन में घन अपार। अब सहज
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