उस ज़ुल्फ़ की याद जब आने लगी इक नागन-सी लहराने लगी जब ज़ि‍क्र तेरा महफ़ि‍ल में छिड़ा क्यों आँख तेरी शरमाने लगी क्या़ मौजे-सबा थी मेरी नज़र क्यों ज़ुल्फ़ तेरी बल खाने लगी महफ़ि‍ल में तेरी एक-एक अदा कुछ साग़र-सी छलकाने लगी या रब यॉ चल गयी कैसी हवा क्यों दिल की कली मुरझाने लगी शामे-वादा कुछ रात गये तारों को तेरी याद आने लगी साज़ों ने आँखे झपकायीं नग़्मों को मेरे नींद आने लगी जब राहे-ज़ि‍न्दगी काट चुके हर मंज़ि‍ल की याद आने लगी क्या उन जु़ल्फ़ों को देख लिया क्यों मौजे-सबा थर्राने लगी तारे टूटे या आँख कोई अश्कों से गुहर1 बरसाने लगी तहज़ीब उड़ी है धुआँ बन कर सदियों की सई2 ठिकाने लगी कूचा-कूचा रफ़्ता-रफ़्ता वो चाल क़यामत ढाने लगी क्या बात हुई ये आँख तेरी क्यों लाखों कसमें खाने लगी अब मेरी निगाहे-शौक़ तेरे रूख़सारों के फूल खिलाने लगी फि‍र रात गये बज़्मे-अंजुम रूदाद3 तेरी दोहराने लगी फि‍र याद तेरी हर सीने के गुलज़ारों को महकाने लगी बेगोरो-कफ़न जंगल में ये लाश दीवाने की ख़ाक उड़ाने लगी वो सुब्ह‍ की देवी ज़ेरे शफ़क़ घूँघट-सी ज़रा सरकाने लगी उस वक्त फ़ि‍राक हुई यॅ ग़ज़ल जब तारों को नींद आने लगी