उस ज़ुल्फ़ की याद जब आने लगी - फ़िराक़ गोरखपुरी's image
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उस ज़ुल्फ़ की याद जब आने लगी - फ़िराक़ गोरखपुरी

उस ज़ुल्फ़ की याद जब आने लगी इक नागन-सी लहराने लगी जब ज़ि‍क्र तेरा महफ़ि‍ल में छिड़ा क्यों आँख तेरी शरमाने लगी क्या़ मौजे-सबा थी मेरी नज़र क्यों ज़ुल्फ़ तेरी बल खाने लगी महफ़ि‍ल में तेरी एक-एक अदा कुछ साग़र-सी छलकाने लगी या रब यॉ चल गयी कैसी हवा क्यों दिल की कली मुरझाने लगी शामे-वादा कुछ रात गये तारों को तेरी याद आने लगी साज़ों ने आँखे झपकायीं नग़्मों को मेरे नींद आने लगी जब राहे-ज़ि‍न्दगी काट चुके हर मंज़ि‍ल की याद आने लगी क्या उन जु़ल्फ़ों को देख लिया क्यों मौजे-सबा थर्राने लगी तारे टूटे या
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