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उर्दू - अली सरदार जाफ़री

हमारी प्यारी ज़बान उर्दू

हमारी नग़्मों की जान उर्दू

हसीन दिलकश जवान उर्दू

ज़बान वो धुल के जिस को गंगा के जल से पाकीज़गी मिली है

अवध की ठंडी हवा के झोंके से जिस के दिल की कली खिली है

जो शेर-ओ-नग़्मा के ख़ुल्द-ज़ारों में आज कोयल सी कूकती है

इसी ज़बाँ में हमारे बचपन ने माओं से लोरियाँ सुनी हैं

जवान हो कर इसी ज़बाँ में कहानियाँ इश्क़ ने कही हैं

इसी ज़बाँ को चमकते हीरों से इल्म की झोलियाँ भरी हैं

इसी ज़बाँ से वतन के होंटों ने नारा-ए-इन्क़िलाब पाया

इसी से अंग्रेज़ हुक्मरानों ने ख़ुद-सरी का जवाब पाया

इसी से मेरी जवाँ तमन्ना ने शायरी का रबाब पाया

ये अपने नग़्मात-ए-पुर-असर से दिलों को बेदार कर चुकी है

ये अपने नारों की फ़ौज से दुश्मनों पे यलग़ार कर चुकी है

सितमगरों की सितमगरी पर हज़ार-हा वार कर चुकी है

कोई बताओ वो कौन सा मोड़ है जहाँ हम झिजक गए हैं

वो कौन सी रज़्म-गाह है जिस में अहल-ए-उर्दू दुबक गए हैं

वो हम नहीं हैं जो बढ़ के मैदाँ में आए हों और ठिठक गए हैं

ये वो ज़बाँ है कि जिस ने ज़िंदाँ की तीरगी में दिए

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