उर तिमिरमय घर तिमिरमय चल सजनि दीपक बार ले! राह में रो रो गये हैं रात और विहान तेरे काँच से टूटे पड़े यह स्वप्न, भूलें, मान तेरे; फूलप्रिय पथ शूलमय पलकें बिछा सुकुमार ले! तृषित जीवन में घिर घन- बन; उड़े जो श्वास उर से; पलक-सीपी में हुए मुक्ता सुकोमल और बरसे; मिट रहे नित धूलि में तू गूँथ इनका हार ले ! मिलन वेला में अलस तू सो गयी कुछ जाग कर जब, फिर गया वह, स्वप्न में मुस्कान अपनी आँक कर तब। आ रही प्रतिध्वनि वही फिर नींद का उपहार ले ! चल सजनि दीपक बार ले !