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उक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बालो-पर निकले - इक़बाल

उक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बालो-पर निकले सितारे शाम को ख़ूने-फ़लक़ में डूबकर निकले हुए मदफ़ूने-दरिया ज़ेरे-दरिया तैरने वाले तमाँचे मौज के खाते थे जो बनकर गुहर निकले ग़ुबारे-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिनको
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