
उक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बालो-पर निकले
सितारे शाम को ख़ूने-फ़लक़ में डूबकर निकले
हुए मदफ़ूने-दरिया ज़ेरे-दरिया तैरने वाले
तमाँचे मौज के खाते थे जो बनकर गुहर निकले
ग़ुबारे-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिनको
Read More! Earn More! Learn More!
