उझकि झरोखे झाँकि परम नरम प्यारी , नेसुक देखाय मुख दूनो दुख दै गई । मुरि मुसकाय अब नेकु ना नजरि जोरै , चेटक सो डारि उर औरै बीज बै गई । कहै कवि गंग ऎसी देखी अनदेखी भली , पेखै न नजरि में बिहाल बाल कै गई । गाँसी ऎसी आँखिन सों आँसी आँसी कियो तन , फाँसी ऎसी लटनि लपेटि मन लै गई ।