जीवन कोई पुस्तक तो नहीं कि जिसे सोच-समझकर योजनाबद्ध ढंग से लिखा जाए-रचा जाए ! उसकी विषयवस्तु को क्रमिक अध्यायों में सावधानी से बाँटा जाए ! स्व-अनुभव से, अभ्यास से सुंदर व कलात्मक आकार में ढाला जाए शैथिल्य और बोझिलता से बचाकर चमत्कार की चमक से उजाला जाए ! जीवन की कथा स्वतः बनती-बिगड़ती है पूर्वापर संबंध नहीं गढ़ती है ! कब क्या घटित हो जाए कब क्या बन सँवर जाए कब एक झटके में