
सचमुच मैं भी होता फकीर
तो हर दिन ऐसा क्यों होता !
घर आता-जाता क्यों हर दिन,
सामान जुटाता क्यों हर दिन,
कुछ खोता-पाता क्यों हर दिन,
करता, पछताता क्यों हर दिन,
अपना हर मोड़ स्वयं मुड़ता,
पँछी-सा खुला-खुला उड़ता,
सचमुच मैं भी होता फकीर...!
फिर क्यों इनसे-उनसे डरता,
क्षण-प्रतिक्षण क्यों तिल-तिल मरता,
करता जो भी, अच्छा करता,
हर आज़ादी का दम भरता,
सब जन-गण-मन अपना होता,
अन्धेरा नहीं घना होता,
सचमुच मैं भी होता फकीर....!
मन क्यों हँसता, मन क्यों रोता,
यश-अपयश होता, न होता
जैसी दिन की, वैसी रातें,
हर समय एक जैसी बातें,
जैसे अपना हर शहर-गाँव,
होता न कहीं कुछ भेद-भाव,
सचमुच मैं भी
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