सचमुच मैं भी होता फकीर तो हर दिन ऐसा क्यों होता ! घर आता-जाता क्यों हर दिन, सामान जुटाता क्यों हर दिन, कुछ खोता-पाता क्यों हर दिन, करता, पछताता क्यों हर दिन, अपना हर मोड़ स्वयं मुड़ता, पँछी-सा खुला-खुला उड़ता, सचमुच मैं भी होता फकीर...! फिर क्यों इनसे-उनसे डरता, क्षण-प्रतिक्षण क्यों तिल-तिल मरता, करता जो भी, अच्छा करता, हर आज़ादी का दम भरता, सब जन-गण-मन अपना होता, अन्धेरा नहीं घना होता, सचमुच मैं भी होता फकीर....! मन क्यों हँसता, मन क्यों रोता, यश-अपयश होता, न होता जैसी दिन की, वैसी रातें, हर समय एक जैसी बातें, जैसे अपना हर शहर-गाँव, होता न कहीं कुछ भेद-भाव, सचमुच मैं भी होता फकीर....! क्षय की क्षय हो या जय की जय, गतियों में लय या महाप्रलय, मन निर्विकार, निर्लिप्त प्राण, क्या त्राहिमाम्, क्या त्राण-त्राण, करता अवनी का ओर-छोर, मानो तृण-कण-कण को विभोर, सचमुच मैं भी होता फकीर...! चहुँओर रँग-सुर-जल-तरँग, होती नद-सी अनहद उमँग, नभ-सी निर्मल प्रत्येक दृष्टि, हर लय में, गति में मधुर सृष्टि, चर-अचर स्वयं निर्माता-सा होता हर व्यक्ति विधाता-सा, सचमुच मैं भी होता फकीर...! क्या काल-देश, क्या राग-द्वेष, क्या शेष और क्या-कुछ अशेष, मानो समस्त में निलय-विलय, सापेक्ष और निरपेक्ष समय, प्राणी-प्राणी स्वयमेव लीन, कोई न हीन, कोई मलीन, सचमुच मैं भी होता फकीर....!