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तो हर दिन ऐसा क्यों होता ! - जयप्रकाश त्रिपाठी

सचमुच मैं भी होता फकीर तो हर दिन ऐसा क्यों होता ! घर आता-जाता क्यों हर दिन, सामान जुटाता क्यों हर दिन, कुछ खोता-पाता क्यों हर दिन, करता, पछताता क्यों हर दिन, अपना हर मोड़ स्वयं मुड़ता, पँछी-सा खुला-खुला उड़ता, सचमुच मैं भी होता फकीर...! फिर क्यों इनसे-उनसे डरता, क्षण-प्रतिक्षण क्यों तिल-तिल मरता, करता जो भी, अच्छा करता, हर आज़ादी का दम भरता, सब जन-गण-मन अपना होता, अन्धेरा नहीं घना होता, सचमुच मैं भी होता फकीर....! मन क्यों हँसता, मन क्यों रोता, यश-अपयश होता, न होता जैसी दिन की, वैसी रातें, हर समय एक जैसी बातें, जैसे अपना हर शहर-गाँव, होता न कहीं कुछ भेद-भाव, सचमुच मैं भी
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