थके गगन में उषा-गान !! तम की अँधियारी अलकों में कुंकम की पतली-सी रेख दिवस-देवता का लहरों के सिंहासन पर हो अभिषेक सब दिशि के तोरण-बन्दनवारों पर किरणों की मुसकान !! प्राची के दिकपाल इन्द्र ने छिटका सोने का आलोक विहगों के शिशु-गन्धर्वों के कण्ठों में फूटे मधु-श्लोक वसुधा करने लगी मन्त्र से वासन्ती रथ का आह्वान !! नालपत्र-सी ग्रीवा वाले हंस-मिथुन के मीठे बोल सप्तसिन्धु के घिरें मेघ-से करें उर्वरा दें रस घोल उतरे कंचन-सी बाली में बरस पड़ें मोती के धान !! तिमिर-दैत्य के नील-दुर्ग पर फहराया तुमने केतन परिपन्थी पर हमें विजय दो स्वस्थ बने मानव-जीवन इन्द्र हमारे रक्षक होंगे खेतों-खेतों औ’ खलिहान !! सुख-यश, श्री बरसाती आओ व्योमकन्यके ! सरल, नवल अरुण-अश्व ले जाएँ तुम्हें उस सोमदेन के राजमहल नयन रागमय, अधर गीतमय बनें सोम का कर फिर पान !!