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तन तेज तरनि ज्यों घनह ओप - चंदबरदाई
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Jun 16, 2020
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तन तेज तरनि ज्यों घनह ओप . प्रगटी किरनि धरि अग्नि कोप . चन्दन सुलेप कस्तूर चित्र . नभ कमल प्रगटी जनु किरन मित्र. जनु अग्निं नग छवि तन विसाल . रसना कि बैठी जनु भ्रमर व्याल . मर्दन कपूर छबि अंग हंति . सिर रची जानि बिभूति पंति . कज्जल सुरेष रच नेन संति . सूत उरग कमल जनु कोर पंति. चंदन सुचित्र रूचि भाल रेष. रजगन प्रकास तें अरुन भेष . रोचन लिलाट सुभ मुदित मोद . रवि बैठी अरुन जनु आनि गोद. धूसरस भूर बनि बार सीस. छबि बनी मुकुट जनु जटा ईस. धमकन्त धरनि इत लत घात. इक श्वास उड़त उपवनह पात. विश्शीय चरित ए चंद भट्ट . हर्षित हुलास मन में अघट्ट
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